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हम छात्र बड़ी टीचर के
दिलीप चिंचालकर (पूर्व छात्र, बाल विनय मंदिर)
जब गुरु और गोविंद सामने खड़े हों तब तो कोई दुविधा ही नहीं कि काके लागू पाँय, लेकिन जब एकाधिक गुरु सामने हों तब पहले चरण स्पर्श उसी का होगा, जो गुरुतर है। स्पष्ट कहें तो टीचरों में बड़ी 'बड़ी टीचर' हैं।

किसी पुराने बब्बू (यों तो वे सारे छात्रों को नाम से जानती थीं, पर बब्बू सबसे लिए उनका प्रिय संबोधन था) से पूछिए, स्कूल की प्रार्थना 'मेरा देश हिन्दुस्तान' को आँखें बंद कर गाने पर भारतमाता के रूप में कौन सामने आता है? जिसने अपना एक बेटा देश पर न्योछावर कर दिया (वही, दो बार महावीर चक्र पाने वाला पी. गौतम) क्या उसकी छवि छात्रों के मन में भारत माँ से अलग होगी?

हम बाल विनय मंदिर वाले तो बावले हैं बड़ी टीचर के नाम से। हमें पढ़ाने वाले कुछ खुर्रट मास्टरों को खौफ लगता होगा बड़ी टीचर का, परंतु उनके कमरे से बुलावा आने पर शैतानी करने वाले बच्चे भी शीश झुकाए रहते थे तो आदर और पश्चाताप की भावना से। डाँट पड़ेगी यह बात तो कभी मन में भी नहीं आती थी, क्योंकि उनसे हमेशा स्नेह की ही सीख मिली।

नर्मदा के इस ओर, मॉन्टेसरी पद्धति और खुद मदाम मॉन्टेसरी के बीच की एकमात्र जीवित कड़ी वही तो थीं। भारत में बच्चों को पढ़ाने के अपने तौर-तरीकों पर मारिया मॉन्टेसरी ने जो कक्षाएँ लीं, उनमें मैत्रेयी पद्मनाभन भी छात्र थीं।

अपने सौंदर्य के बल पर हजार युद्धपोत तैराने वाली ट्रॉय की रूपगर्विता हेलेन भी इंदौर की इस हेलन के सामने क्या टिकेगी, जिसने अपनी शिक्षा और संस्कारों के बल पर सहस्र संस्थाएँ खड़ी की।

तात्पर्य इंदौर शहर की आधा दर्जन नामचीन शिक्षण संस्थाओं से नहीं तो उन अनगिनत छात्रों से है, जो देश और विदेश में अपनी उपलब्धियों के कारण बड़ी टीचर नामक संस्था की पताका फहराती उपशाखाएँ हैं।
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