यूँ तो कभी किसी गुरु की सीख खत्म नहीं होती, तो जाहिर है 'बड़ी टीचर' की सीख भी खत्म नहीं होगी, लेकिन उनकी इस पारी को ईश्वर ने विराम दे दिया। उम्र की 94वीं पारी खेलते हुए वे इंदौर के घर-घर में किसी न किसी को सीख दे चुकी थीं।
उनके सिखाए हुए अर्जुन और एकलव्य दुनियाभर में अपनी सफलता की पताका फहरा रहे हैं और 'बड़ी टीचर' के अवसान की इस खबर से उनकी भी आँखें गीली होने से नहीं रहेंगी। इससे बड़ी सेवा और क्या होगी कि सेवानिवृत्ति के बाद करीब 40 साल तक वे पढ़ाती रहीं।
आज जो बाल विनय मंदिर उत्कृष्ट विद्यालय के रूप में नजर आ रहा है, उसकी नींव श्रीमती पद्मनाभन ने ही डाली थी। 1929 में इंदौर आने के बाद 1942 में जब इंदौर के शासक होलकरों ने प्रयोग के तौर पर नर्सरी स्कूल की स्थापना की, तो श्रीमती पद्मनाभन उसमें निदेशिका बनीं। उनका 'गुरुत्व' ऐसा था कि 1966 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1969 में वे शासकीय सेवा से निवृत्त हुईं और तब तक उन्होंने बाल विनय मंदिर में उत्कृष्टता के बीज डाल दिए थे, जो आज पेड़ के रूप में सामने हैं। इसके बाद वे डेढ़ साल तक अमेरिका में रहीं।
1971 में वे ग्रेसिम मिल नागदा की शिक्षा संस्था से जु़ड़ीं और फिर अमेरिका चली गईं। 1972 में जब टी. चोइथराम मांटेसरी स्कूल बना तब वे उसकी संस्थापक प्राचार्य थीं।
दो माह पहले यानी 24 जनवरी को ही उनका जन्मदिन गया। 1914 में मैत्रेयी तमिलनाडु के कुंभकोणम में मजिस्ट्रेट के. नारायणराव की पाँचवीं संतान के रूप में पैदा हुईं और 21 जनवरी 1929 को होलकर कॉलेज में भौतिक के प्राध्यापक श्री नीलकंठ पद्मनाभन के साथ ब्याहकर इंदौर आ गईं।
15 साल की उम्र में वे घर और बाहर दोनों संभालती रहीं। हाईस्कूल और इंटर करने के बाद वे होलकर कॉलेज में बीएससी (गणित) करने पहुँचीं। अँगरेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। 1939 में मद्रास में मैडम मॉन्टेसरी से मॉन्टेसरी ट्रेनिंग ली।
इंदौर को एक और देन उन्होंने दी। वह थी स्कूलों में टिफिन की व्यवस्था। खुद भी चॉकलेट और आइसक्रीम की शौकीन थीं। बाल विनय, चोइथराम, सत्यसाँई विद्या विहार, पीएम अग्रवाल को उन्होंने ही सँवारा। बच्चों से तो गहरा रिश्ता था ही, उनके माता-पिता को भी वे बखूबी जानती थीं। वे इस बात की हिमायती थीं कि पालकों को स्कूल आकर देखना चाहिए कि उनका बच्चा क्या कर रहा है। गौतम, अशोक, कृष्णा और अजीत ये चारों उनके बेटे थे, लेकिन वे इंदौर में अकेली रहती थीं। इनमें से गौतम और अजीत नहीं रहे।
झूम जाते थे लोग : बात 10 अक्टूबर 2004 की है। जगदाले स्कूल में राष्ट्रीय बाल आनंद महोत्सव चल रहा था। उद्घाटन समारोह में 'बड़ी टीचर' ही थीं। अपने संबोधन में 'नईदुनिया' की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उसमें किसी समय प्रकाशित एक गीत लय में गाना शुरू कर दिया। गीत कुछ इस तरह था-
'नन्हे राही ओ नन्हे राही, गाता चल मुस्कराता चल, जीवन के गीत सुनाता चल...'। तब उनकी उम्र 91 वर्ष थी और उनको गाता देख पूरा हॉल गाने लगा। बच्चों ने सुर में सुर मिलाए।
अपने बारे में ये कहा : जब मैं आठ वर्ष की थी तभी मेरे पिता का देहांत हो गया था। माँ ने पिता के अनन्य मित्र के पास अडयार में थियोसॉफिकल सोसायटी भेज दिया। उन्होंने मुझे डॉ. एनी बेसेंट द्वारा स्थापित आवासीय विद्यालय 'नेशनल स्कूल' में भर्ती करा दिया।
विवाह के बाद जब इंदौर आई तब मैंने आठवीं भी पास नहीं की थी। मेरे पति प्रो. पद्मनाभन ने मुझे ड्राइंग के अतिरिक्त सभी विषयों को पढ़ाया। 1930 में पंजाब बोर्ड से प्राइवेट मैट्रिक पास की।
अनुशासन पर उनकी राय : वे मानती थीं कि अनुशासन का विस्तार सीधे रूप से शिक्षण प्रणाली से जु़ड़ा है, जो शिक्षार्थियों पर एक कठोर प्रहार है। इसके अतिरिक्त शिक्षार्थी को उसके चारों ओर नागरिकों और इनसे भी अधिक राजनेताओं की अनुशासनहीनता के मध्य रहने को बाध्य होना पड़ता है।
जब तक हम सभी अनुशासनबद्ध व्यवहार नहीं करते, हमें यह आशा नहीं करना चाहिए कि केवल विद्यार्थी ही अनुशासन के दायरे में रहें। मेरे विचार से महत्वपूर्ण यह है कि सभी पुरुष और महिलाओं को आदर्श पालक की भूमिका का निर्वाह करना चाहिए, ताकि हम हमारे देश के भावी नागरिकों और वृहद रूप से दुनिया के व्यक्तियों के हितों की रक्षा कर सकें।
निःसंदेह मुझे अनेक विपत्तियाँ झेलनी पड़ीं। मैंने उन त्रासदियों को मेरे हृदय में गहरे दफना दिया है। ऐसा मैं इसलिए कर सकी, क्योंकि मेरे सह- कार्यकर्ताओं और विद्यालयों के विद्यार्थियों ने अपने स्नेह से मुझे सराबोर कर दिया।
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