शालिनी मोघे पद्मनाभन और मेरी उम्र लगभग बराबर है। हम दोनों में केवल तीन-चार माह का ही अंतर था। कार्यों में उम्र की समानता व एक लक्ष्य दिखाई देता है। हमारा कार्यक्षेत्र भी एक ही था और दोनों की विचारधारा भी एक ही थी।
हमारी मुलाकात तब हुई, जब वे होलकर साइंस कॉलेज में पढ़ती थीं। हमने अबोध बालक से लेकर युवावस्था तक के विद्यार्थियों के लिए कार्य करने का निर्णय लिया और हरसंभव प्रयास भी किया।
जब भी मुझे कोई परेशानी आती थी, मैं पद्मनाभन के पास बिना झिझक के पहुँच जाती थी और वे भी मेरे पास चली आती थीं। हम दोनों एक-दूसरे से मिलने के लिए किसी तरह की औपचारिकता नहीं निभाते थे। यहाँ समस्या जन्म लेती और वहाँ हम दोनों एक होकर उसके निदान के लिए प्रयासरत हो जातीं।
हाँ, वे जब भी किसी समस्या के निदान के लिए मेरे घर या स्कूल आती थीं, समाधान के लिए मोघे साहब को भी शामिल करती थीं और हम तीनों मिलकर सलाह-मशविरा करते थे। उनके मन में बच्चों के प्रति अथाह प्रेम था। इतने वर्षों में मैंने आज तक किसी भी बच्चे के प्रति उनके मन में भेदभाव नहीं देखा और न ही कभी वे किसी बच्चे पर नाराज हुईं।
मैं यह तो नहीं कहती कि हम दोनों एक समान थे, क्योंकि मैं उस महान नारी की कभी बराबरी नहीं कर सकती। अपने अंतिम दिनों तक समाज का हित चाहने वाली मैत्रेयी पद्मनाभन ने बच्चों के विकास, संस्कार और प्रगति के लिए न केवल सकारात्कम कार्य किए वरन सतत् प्रयत्नशील भी रहीं। वे यही चाहती थीं कि बालकों का भविष्य सँवारा जाए।
अनगिनत गुणों की धनी वह महिला शास्त्रीय संगीत के बारे में भी उतना ही जानती थी जितना की नाट्य कला के बारे में। शास्त्रीय संगीत की यह ज्ञाता भरतनाट्यम में इतनी दक्ष थी कि कई बार तो भरतनाट्यम सिखाने वालों को ही उनकी कमियों से अवगत करा देती थीं।
भरतनाट्यम के दौरान हर पात्र के अनुसार अपने चेहरे के भाव वे कुछ इस तरह बताती थीं कि मानो साक्षात वह पात्र उनके शरीर में समाहित हो चुका हो। जब वे किसी नाटक के किरदार के बारे में बच्चों को अभिनय करके दिखाती थीं तो बच्चे स्वयं ही नाटक की बारीकियाँ सीख जाते थे। मैं उन्हें कभी नहीं भूल सकती।
वे समय की पाबंद थीं। मैं भले ही कहीं पहुँचने में देरी कर दूँ, पर वे निश्चित समय पर ही पहुँचती थीं और मेरे पहुँचते ही मुझे शालिनी ताई कहते हुए गले लगा लेतीं। पिछले साल हम महिला दिवस पर मिले थे तब भी उसने मुझे हर बार की तरह गले लगाया और आज वे मुझे छोड़कर चली गईं! अपने अनगिनत गुणों का उन्होंने कभी खुद बखान नहीं किया और न ही यह चेष्टा की।
अभिमानरहित जीवन जीने वाली पद्मनाभन मिलनसार थीं और उस नारी ने ही मुझे भी वार्षिकोत्सव आयोजित करना सिखाया। यही नहीं, वे खुद वार्षिकोत्सव की तैयारी करती थीं। गुणों से धनी इस महिला के समान दूसरा व्यक्तित्व अब कभी नहीं मिलेगा, ऐसी महिला नहीं मिलेगी।
हमारे इस बिछोह का दु:ख शायद कोई न समझे, पर उस महान नारी के विचारों और कार्यों को समझकर बढ़ावा दिया जाना चाहिए। बच्चों के लिए जो कार्य वे करना चाहती थीं वह कार्य हो और ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।
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