नौ साल की बालिका मल्लेशम्मा हर दिन पाँच बजे उठती है और 6 बजे कपास के खेत में होती है। दोपहर तक वह वहाँ काम करती है और फिर सारे काम भी करती है। बाल श्रमिक के तौर पर आंध्र के कुरनूल जिले के वंडागल्लू में काम करने वाली इस लड़की का बचपन खो गया है। यह अकेली मल्लेशम्मा की कहानी नहीं है, वरन रूपकुमार भी कुछ इसी तरह से जीवन बिता रहा है, जबकि वह विकलांग है।
यहाँ बाल श्रम पर आयोजित चौथे सम्मेलन में मल्लेशम्मा, रूप कुमार और रेश्मा जैसे कई बच्चों ने शिरकत की है, जिनका बचपन खो चुका है। सबकी अलग-अलग पी़ड़ा है और हर कदम जंग है। इसमें करीब 1000 बच्चों ने भाग लिया। इनमें से कुछ अभी भी पीडि़त हैं और कुछ छु़ड़ा लिए गए हैं।
मल्लेशम्मा जिन परिस्थितियों में काम करती है, उनमें कई तरह की बीमारियों की आशंका रहती है, लेकिन यदि काम नहीं करेगी तो खाएगी क्या। यह उसकी मजबूरी है। सिरदर्द, बुखार कुछ भी हो, उसे काम करना होता है। खेतों में कीटनाशकों के छींटे जाने के कारण उसे चक्कर तक आने लगते हैं, लेकिन 11 घंटे काम करके वह अपने पिता का कर्ज भी चुका रही है। हर घंटे तीन रुपए मजदूरी के रूप में मिलते हैं।
यही हाल विकलांग रूपकुमार (14) का है। वह बिहार के बेगूँसराय जिले के एक गाँव में रहता है। 12 घंटे वह एक कारखाने में काम करता है, साथ में पिता भी हैं जो इसी कारखाने में काम करते थे। क्षय रोग हो जाने के कारण वे कारखाने में आ नहीं पाते और घर का जिम्मा रूपकुमार के दम पर चलता है। सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति उड़ीसा में भुवनेश्वर के पास ईंट के भट्टे पर काम करने वाली रेशमा की है।
12 साल की इस नन्हीं जान के दूध के दाँत भी नहीं टूटे थे कि उसके साथ एक वहशी ने काम के दौरान बलात्कार किया। पिता की मौत होने के बाद वह बोलंगीर जिले से आई थी। टीचर बनना चाहती है। भट्टे का मालिक पिटाई करता था, शिकायत की, उसे छु़ड़ाया, अब एक छात्रावास में रहती है, लेकिन हारी नहीं है।
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