बेहिसाब जिंदगियों और अनगिनत हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ देने वाले नक्सलवाद के कहर का एक और भयावह असर अब छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर क्षेत्र के मासूम छात्र-छात्राओं पर दिख रहा है।
लंबे समय से लगातार जारी माओवादी हिंसा से दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों के बच्चे पढ़ाई में पिछड़ते जा रहे हैं। आएदिन होने वाले नक्सली खून-खराबे से भयभीत होने के कारण अच्छी तरह पढ़ाई नहीं कर पाने से इस क्षेत्र में पिछले साल माध्यमिक शिक्षा मंडल की 10वीं और 12वीं की परीक्षा में सैकड़ों छात्र-छात्राएँ फेल हो गए, जबकि वर्तमान में चल रही इस वर्ष की परीक्षाओं में तो बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ शामिल ही नहीं हो रहे।
शिक्षा विभाग के सूत्र भी इस सच को स्वीकारते हैं। उनका कहना है कि नक्सली हिंसा के कारण पहले ही घर से उजड़कर शिविरों में रह रहे मासूमों के पढ़ाई में पिछड़ जाने में कुछ भी अचरजभरा नहीं है। बच्चों का कोमल मन खून-खराबे के बीच सहज नहीं रह सकता।
सरकारी आँकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। नक्सली हिंसा की दहशत से बच्चों को उबारने के लिए ही दो वर्ष पूर्व सरकार ने पहली से लेकर सातवीं कक्षा तक छात्र-छात्राओं को जनरल प्रमोशन देते हुए सीधे उत्तीर्ण कर दिया था।
पिछले वर्ष मार्च में परीक्षा के दौरान बीजापुर जिले के रानीबोदली में नक्सलियों ने 55 जवानों की हत्या कर दी थी तथा दंतेवाड़ा जिले में भी बारूदी सुरंग विस्फोट कर आठ जवानों को शहीद कर दिया था। नक्सलियों ने पिछले दो साल में इन दो जिलों में 70 से अधिक स्कूल भवनों को भी विस्फोट कर उड़ा दिया।
जिला शिक्षा अधिकारी डीसी पटेल ने बताया कि बीजापुर जिले के तोडेनार केंद्र में इस वर्ष 10वीं के मात्र 44 छात्र-छात्राएँ ही परीक्षा में शामिल हो रहे हैं जबकि एक भी छात्र 12वीं की परीक्षा नहीं दे रहा।
नक्सलियों के खिलाफ राज्य में चलाए जा रहे सलवा जुड़ूम आंदोलन के कुछ नेताओं ने तो यहाँ तक दावा किया कि माओवादी जानबूझकर बच्चों को पढ़ाई से विमुख कर अपने साथ रखना चाहते हैं। उनका दावा है कि नक्सलियों ने डरा-धमकाकर बड़ी संख्या में बच्चों को अपने प्रशिक्षण शिविरों में भी रखा है।
बीजापुर जिले के तोपनार में दसवीं कक्षा के छात्र आयतु ने बताया कि पिछले साल ऐन परीक्षा के दौरान हुई नक्सली हिंसा के कारण वह और उसके कई साथी मानसिक रूप से विचलित हो गए और ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाए। उसके साथ परीक्षा देने वाले 30 में से मात्र दो छात्र ही उत्तीर्ण हो पाए।
बासागुड़ा के एक छात्र के पिता हासिम ने कहा कि नक्सली हिंसा के कारण दक्षिण बस्तर के छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल नहीं जा रहे। गाँवों के उजड़ जाने और लोगों के सलवा जुड़ूम शिविरों में रहने के असर से बच्चे अछूते नहीं रह सकते। दहशत में रहकर मासूम बच्चों से भला बेहतर पढ़ाई की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है।
नक्सली हिंसा से उपजी इस विचित्र सामाजिक समस्या का ही शायद असर है कि इस क्षेत्र में साक्षरता दर 25 प्रतिशत से भी कम है और इन जिलों के छात्र-छात्राएँ अब माँग कर रहे हैं कि नौकरी देने के मामले में सरकार उन्हें विशेष रियायत दे। उन्होंने नौकरी की अर्हता के लिए जरूरी प्रतिशत को उनके लिए काफी कम करने का आग्रह किया है।
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