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शशांक शेखर की रवानगी तय!
शशांक शेखर सिंह के बतौर कैबिनेट सचिव बने रहने के दिन पूरे हो चुके हैं और कभी भी उन्हें इस पद से हटाया जा सकता है क्योंकि जब केन्द्र सरकार ने उच्च न्यायालय मे हलफनामा दाखिल कर उनकी नियुक्ति असंवैधानिक मानी तबसे मायावती सरकार की सर्वत्र निंदा हो रही है। मायावती के नजदीकी भी कह रहे हैं कि आखिर बड़े कानूनविद के रहते मायावती को झटका लगा कैसे? इससे सरकार दबाव में आ गई है।

उल्लेखनीय है कि सोमवार 3 मार्च को उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की ओर से शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। केंद्र सरकार की ओर से एडीशनल सालीसिटर जरनल डॉ. अशोक निगम एवं सहायक सालीसिटर जरनल ऋतुराज अवस्थी ने शपथ-पत्र प्रस्तुत कर कहा कि प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद बनाकर और उस पर शशांक शेखर की नियुक्ति असंवैधानिक है।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि केंद्र सरकार के समान प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद सृजित करना संविधान की मौलिक एकरूपता के खिलाफ है। यह पद आईएएस कैडर रूल्स के तहत सृजित होना चाहिए। राज्य में पहली बार इस तरह का पद गठित किया गया है, जबकि आजादी के बाद से इस प्रकार का कोई पद नही रहा है। केंद्र सरकार की ओर से शपथ-पत्र कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय के निदेशक चैतन्य प्रसाद की ओर से प्रस्तुत किया गया।

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि प्रदेश सरकार ने कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर गलत परंपरा की शुरूआत की है। कहा गया कि जिस तरह केंद्र सरकार के सिविल सर्विसेज में कैबिनेट सचिव का पद उच्च होता है उसी तरह प्रदेश में मुख्य सचिव पद उच्च होता है। प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर पद व उसकी गरिमा को गहरा आघात पहुंचाया गया है।

राज्य सरकार ने कैबिनेट सचिव का पद सृजित करने के दौरान यह स्पष्ट नहीं किया कि इस पद पर नियुक्ति की क्या योग्यता एवं शर्तें है। केंद्र सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के पुराने निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य में कैबिनेट सचिव के पद को अनुचित करार दे चुका है।

दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से गोपन विभाग के विशेष सचिव कृष्ण गोपाल की ओर से शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता देवेन्द्र कुमार उपाध्याय ने कहा 29 फरवरी को कैबनेट सचिव शशांक शेखर ने स्वेच्छा से कैबिनेट मंत्री का दर्जा एवं प्रशासनिक प्रमुख पद छोड दिया है।

राज्य सरकार ने 18 मई 2007 के शासनादेश को वापस ले लिया है जिसके तहत राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष शशांक शेखर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। यह भी कहा गया कि राज्य सरकार की कार्य नियमावली में किसी भी अधिकारी को कैबिनेट सचिव बनाने का प्रावधान है।

ऐसी स्थिति में याचिका के लंबित रहने का कोई औचित्य नही है एवं याचिका खारिज होने योग्य है। वहीं याची की ओर से प्रति उत्तर शपथ-पत्र प्रस्तुत करने के लिए समय की माँग की गई है। इस पर अदालत में 19 मार्च को याचिका पर सुनवाई करने का आदेश दिया।
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