फिल्म 'जोधा-अकबर' के निर्माता आशुतोष गोवारीकर भले ही यह सफाई देते रहें कि उन्होंने इस फिल्म को बनाते समय ऐतिहासिक तथ्यों से कोई छेड़छाड़ नहीं की है, परंतु इतिहासकारों का मत उनसे भिन्न है। उनका मानना है कि मनोरंजन के नाम पर तथ्यों से छेड़छाड़ की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालाँकि वे 'जोधा-अकबर' पर जारी विवाद को गैर जरूरी मानते हैं।
हाल ही में सीतामऊ (मंदसौर) के 'नटनागर शोध संस्थान' द्वारा इतिहास पर आयोजित सेमिनार में देश के अलग-अलग कोने से भाग लेने आए इतिहासविदों से हमने इस विषय पर चर्चा की।
जम्मू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जिगर मोहम्मद का मानना है कि ऐतिहासिक ग्रंथों में यह उल्लेख नहीं मिलता कि अकबर की जोधाबाई नामक कोई पत्नी थी। अबुल फजल ने भी 'आईन-ए-अकबरी' में जोधाबाई के नाम का उल्लेख नहीं किया है। असल में जोधाबाई अकबर के बेटे जहाँगीर की पत्नी थी।
प्रो. जिगर का मानना है कि यदि तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश किया जाएगा तो इससे समाज में विकृति पैदा होगी। फिल्मों को समाज को जोड़ने का काम करना चाहिए, न कि तोड़ने का। हालाँकि वे मानते हैं कि इस मामले में समूचा विवाद स्वयं फिल्म वालों ने ही खड़ा किया क्योंकि इससे उन्हें प्रचार मिलता है।
कोटा ओपन यूनिवर्सिटी, कोटा के डॉ. याकूब अली मानते हैं मनोरंजन के लिहाज से फिल्म ठीक हो सकती है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों को नहीं बदला जा सकता। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि 'जयपुर का इतिहास' लिखते समय प्रसिद्ध इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार से कुछ तथ्य बदलने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने इससे स्पष्ट इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि तथ्यों से यदि छेड़छाड़ की जाएगी तो इससे समाज भ्रमित होगा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. जीडी गुलाटी का मानना है कि दर्शकों को फिल्म को फिल्म के हिसाब से ही लेना चाहिए। इस मामले में ज्यादा हंगामा नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि डॉ. गुलाटी विरोध को गलत नहीं मानते। वे कहते हैं कि लोगों की आपत्ति जायज है क्योंकि पारसी साहित्य में कहीं भी अकबर की पत्नी के रूप में जोधाबाई के नाम का उल्लेख नहीं है।
'मुगले आजम' के समय इस बात का विरोध क्यों नहीं किया गया? प्रो. गुलाटी कहते हैं कि यह फिल्म अनारकली पर केन्द्रित थी न कि जोधाबाई पर। इस फिल्म में जोधा और अकबर के प्रेम प्रसंग भी नहीं थे न ही उस समय के प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली नहीं थे, इसलिए इस फिल्म को लेकर विवाद पैदा नहीं हुआ। वे मानते हैं कि यदि किसी तथ्य को लेकर विवाद है तो फिल्म से उन हिस्सों को हटाया जा सकता है। पहले भी विवादित दृश्यों को फिल्मों से हटाया और जोड़ा जाता रहा है।
जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली के डॉ. मोहम्मद ताजिम कहते हैं कि फिल्में ऐतिहासिक नहीं होतीं। उन्हें दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। फिल्म निर्माता का एकमात्र उद्देश्य फिल्म को हिट कराना होता है। वे मानते हैं इस तरह के विवाद जान-बूझकर पैदा किए जाते हैं। डॉ. ताजिम के के मुताबिक 'जोधा-अकबर' का इतिहास का से कोई वास्ता नहीं है। ऋतिक रोशन के रूप में इस फिल्म में अकबर को दिखाया गया है, जबकि वास्तविकता में अकबर इतना लंबा (ऋतिक जितना) था ही नहीं। इस तरह के विवाद पैदा कर सिर्फ कमाई की जा रही है।
जामिया मिलिया इस्लामिया के ही प्रो. इराक रजा जैदी मानते हैं कि इस तरह के विवाद फिल्म को चलाने के लिए पैदा किए जाते हैं। जिस तरह मीडिया इस पूरे मामले को पेश कर रहा है, इससे फिल्म का मुफ्त में विज्ञापन ही हो रहा है। मंदसौर के बाबूलाल माली 'विषपायी' का मानना है कि समाज का एक बड़ा वर्ग फिल्म को देखना चाहता है। समूचा विरोध एक छोटे से वर्ग की देन है। यदि उन्हें आपत्ति थी तो फिल्म की स्क्रिप्ट पहले ही देखनी चाहिए थी। (अमरसिंह कुशवाह द्वारा फोन पर करवाई गई बातचीत पर आधारित)
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