देश पर अपने प्राण न्योछावर करने वाले सैन्य अधिकारी के परिवार को भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था ने इस कदर परेशान कर डाला कि उसने शहीद के नाम से मिले पेट्रोल पंप को छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी। जबकि दूसरी ओर भ्रष्ट तंत्र के कारण भुखमरी के कगार तक पहुँच गए इस परिवार को नवंबर में सरेंडर इस पेट्रोल पंप का बिजली-पानी का बिल अब भी देना पड़ रहा है।
कारगिल युद्ध के दौरान तोलोलिंग पहाड़ी पर पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ते हुए अपने देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले मेजर विवेक गुप्ता को कौन नहीं जानता होगा, जिन्होंने देश के लिए प्राण देते वक्त यह कभी भी नहीं सोचा होगा कि जिस देश के लिए वे अपने प्राण दे रहे हैं, उसी देश का भ्रष्ट सरकारी तंत्र उसी के अपने परिवार को सम्मान देने की जगह भुखमरी के कगार पर इस कदर खड़ा कर देगा, जहाँ वह दो जून की रोटी तक के लिए मोहताज हो जाए।
लेकिन यदि इस सरकारी तंत्र की कारगुजारी पर नजर दौड़ाई जाए तो इस तंत्र ने उन्हें इस कदर परेशान किया कि उन्होंने सरकार द्वारा भरण-पोषण के लिए हरावाला में लक्ष्मण सिद्ध मोड़ के पास मिले हिन्दुस्तान पेटोलियम के पेट्रोल पंप को सरेंडर करने में ही अपनी भलाई समझी।
शहीद विवेक गुप्ता के पिता कर्नल वीआरएस गुप्ता भी फौजी अधिकारी रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कभी भी नही सोचा था कि उनके बेटे द्वारा देश के लिए प्राण देने के बाद वे असहाय हो जाएँगे। उन्होंने बताया कि सरकार ने भरण पोषण के लिए उन्हें वह पेट्रोल पंप दिया था, लेकिन भ्रष्ट अफसरशाही के चलते उल्टे उन्हें ही इस पंप को जिंदा रखने के लिए पेंशन में मिलने वाली रकम खर्च करनी पड़ी।
उनका कहना है कि हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के अधिकारियों व कर्मचारियों ने जब उनसे ईमानदारी से कार्य करने के बजाय हेराफेरी करने की सलाह दी और उनसे पैसे की माँग की तो उन्होंने फौजी होने के नाते इससे साफ मना कर दिया। बस, तब क्या था उन्हीं अधिकारियों द्वारा तरह-तरह से इन्हें परेशान किया जाने लगा। उनके अनुसार उनकी किसी ने नहीं सुनी और सभी पैसे की माँग करने लगे।
गुप्ता ने कहा कि जब मैंने इन अधिकारियों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा सारे पेट्रोल पंप वाले उन्हें माहवारी पैसे देते हैं। तुम क्यों नहीं दे सकते? उन्होंने कहा कि मैंने इन अधिकारियों को बताया कि एक सैनिक होने के नाते वे इस तरह का कार्य नहीं कर सकते।
इतना ही नहीं उन्हें देहरादून मसूरी प्राधिकरण के अधिकारियों से भी शिकायत है, जिन्होंने पाँच साल तक उनके पेट्रोल पंप के लिए दी गई भूमि का भू-उपयोग जानबूझकर परिवर्तित नहीं किया जबकि सरकार ने साफ कहा था कि ऐसे शहीद सैनिकों के भू-उपयोग को परिवर्तित करने की जिम्मेदारी सरकार की थी।
इनका कहना है कि इतना ही नहीं प्राधिकरण के अधिकारी भी समय-समय पर इनसे पैसे की माँग करते थे तथा वे इसके बदले तेल में मिलावट व घटौती तक करने को हमें प्रोत्साहित करते थे।
भुखमरी के कगार तक पहुँचने की कहानी को बयान करते हुए शहीद विवेक गुप्ता के पिता का कहना है कि जब उन्हें 2002 में यह पेट्रोल पंप मिला था तब हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के अधिकारियों ने उनसे शर्त रखी थीं कि उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति रोजगार पर नहीं होना चाहिए तथा यदि उन्हें पेट्रोल पंप लेना है तो उसे रोजगार छोड़ना होगा।
कर्नल गुप्ता के अनुसार उनकी पुत्री रेणु गुप्ता ओएनजीसी में नौकरी करती थी। हमने सोचा था कि इस पेट्रोल पंप से इतनी आय होगी कि हम दोनों बाप और बेटी के जीवन का भरण पोषण ठीक ढंग से हो जाएगा। यही सोचकर हमने बेटी की भी नौकरी छुड़वा दी और अब हम भुखमरी के कगार पर आ गए हैं।
उनका कहना है कि नौ नवंबर 2007 को हमने हिन्दुस्तान पेट्रोलियम को यह पंप सरेंडर कर दिया है, लेकिन इसके अधिकारी अभी तक यह पंप अपनी गर्दन मामले में फँसने के कारण सुपुर्दगी लेने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने मात्र अपने सुरक्षा गार्ड ही वहाँ तैनात किए हैं, जबकि वहाँ के बिजली व पानी के बिल अभी भी हमारे नाम आ रहे हैं।
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