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'इस्लाम में ‍हिंसा की जगह नहीं'
दारूल उलूम में आतंकवाद के खिलाफ सम्मेलन
आतंकवाद के तमाम रूपों की निंदा करते हुए भारत के शीर्ष मुस्लिम संगठनों ने सोमवार को एक प्रस्ताव पारित कर कहा कि हिंसा इस्लाम के शांति और भाईचारे के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है।

देवबंद स्थित इस्लामी शिक्षण संस्थान दारूल उलूम में आतंकवाद के खिलाफ आयोजित सम्मेलन में मुस्लिम संगठनों की ओर से स्वीकृत एक प्रस्ताव में आम मुसलमानों और मदरसों की छवि बिगाड़ने के प्रयासों की भी निंदा की गई। इस सम्मेलन में उलेमा मुस्लिम विद्वानों और धार्मिक नेताओं ने भाग लिया।

प्रस्ताव में कहा गया कि इस्लाम दया और मानवता का धर्म है। इस्लाम सभी प्रकार की हिंसा और आतंकवाद के सभी रूपों की कड़ी निंदा करता है। यह दंगा हत्या जैसे कार्यों को पाप और अपराध मानता है।

सम्मेलन में भाग लेने वाले करीब 10 हजार प्रतिभागियों की ओर से स्वीकार किए गए प्रस्ताव में कहा गया कि इस्लाम निर्दोष व्यक्तियों की हत्या के खिलाफ है।

सम्मेलन में मौजूदा वैश्विक स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई गई जिसमें अधिकतर देश मुसलमानों के खिलाफ प्रतिकूल रुख अख्तियार कर रहे हैं। सम्मेलन में आतंकवादी गतिविधियों के लिए मुसलमानों विशेष रूप से धार्मिक संस्थानों को जिम्मेदार ठहराए जाने की भी आलोचना की गई।

दारूल उलूम के जनसंपर्क अधिकारी आदिल सिद्दीकी ने कहा कि आतंकवाद की बीमारी की पहचान गलत तरीके से की जा रही है। जब भी कहीं आतंकवाद की घटना होती है तो उसे मुसलमानों विशेष रूप से मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों से जोड़ने की हरसंभव कोशिश की जाती है। यह गलत है। उन्होंने कहा कि बीमारी के सही कारण का पता लगाया जाना चाहिए। तभी उसका सही उपचार संभव है।

उन्होंने कहा कि हाल में कुछ ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जहाँ निर्दोष लोगों को आतंकवाद में फँसाया गया है। सम्मेलन के दौरान स्वीकार किए गए प्रस्ताव में कहा गया है कि कई निर्दोष मुसलमान अपना जीवन सलाखों के पीछे व्यतीत कर रहे हैं, जबकि उनकी कोई गलती नहीं है।

प्रस्ताव में कहा गया है, जो लोग आतंकवाद फैला रहे हैं, पुलिस थानों पर हमले कर रहे हैं, पुलिसकर्मियों की हत्या कर रहे हैं, अवैध हथियारों को लेकर कहीं भी आ-जा रहे हैं सरकार ऐसे लोगों पर लगाम लगाने और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी एहतियाती उपाय नहीं अपना रही है।

सम्मेलन में पुरजोर तरीके से यह माँग की गई कि सरकार को मदरसों और मुसलमानों की खराब हो रही छवि को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। देशभर के 6000 मदरसा प्रतिनिधि इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। यह एशिया में अपनी तरह का पहला सम्मेलन है।
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