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फिल्मों ने बनाया युवाओं को देशभक्त
सुप्रसिद्ध भजन एवं गजल गायक अनूप जलोटा मानते हैं कि हिंदी फिल्मों एवं भारतीय संगीत ने देश की युवा पीढ़ी में देशभक्ति एवं देश के प्रति वफादारी की भावना पैदा की है।

अनूप जलोटा ने एक साक्षात्कार में कहा कि भारतीय युवा वर्ग में देश के प्रति वफादार होने की भावना हिन्दी फिल्म एवं भारतीय संगीत के कारण आई है।

'मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो' और 'ऐसी लागी लगन' जैसे दिल को छू लेने वाले भजन गाकर लोगों के दिलों पर राज करने वाले जलोटा ने कहा कि आमीर खान, शाहरुख खान एवं एआर रहमान ने हाल के दिनों में युवा वर्ग में नई जाग्रति लाने में अहम भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि युवा संगीतकार एआर रहमान के 'वंदे मातरम' ने लोगों पर जादू का-सा असर किया है। इसी प्रकार शाहरुख खान की 'चक दे इंडिया' ने युवा वर्ग और बच्चों को दीवाना बनाया।

आमिर खान की देशभक्ति से जुड़ी अनेक फिल्मों ने युवा मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। जलोटा ने कहा कि इन लोगों के देशभक्तिपूर्ण काम ने देश में राजनेताओं की कम होती भूमिका की भरपाई की है और हाल यह है कि आज का युवा इन्हें ही अपना आदर्श मानता है और इनकी फिल्मों और संगीत के नक्शेकदम पर अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की कसमें खाता है।

जलोटा ने कहा कि आज देश में राजनेताओं के अभाव में संगीत ने लोगों को एकता के सूत्र में बाँधे रखने में महती भूमिका निभाई है।

भजन गायकी के अपने लगभग तीन दशक के सफर की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने गाए सभी भजन प्यारे हैं, लेकिन 'चदरिया झीनी रे झीनी कि राम रस भीनी' सर्वाधिक पसंद है।

इस भजन में अनूप जलोटा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत के 13 रागों का अनोखा सम्मिश्रण किया है। इस भजन में उन्होंने मुख्यत: राग मालकौंस, राग देस केदार, काफी बसंत एवं भैरवी का सम्मिश्रण किया है।

जलोटा ने बताया कि इसके अलावा सर्वलोकप्रिय 'मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो' गाकर उनके दिल को अतिसंतुष्टि प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि मैं जब यह भजन गाता हूँ तो ऐसा आभास होता है मानो नटखट किशन कन्हैया स्वयं मेरे सम्मुख खड़े हैं और उनकी बाल लीलाएँ देखने का हमें अवसर मिला है।

इस भजन की खूबी बताते हुए उन्होंने कहा कि जब माँ यशोदा भगवान कृष्ण से गुस्से में पूछती हैं तो इसी भजन की एक पंक्ति में कुछ महिलाओं के भेद से पूरा अर्थ ही कवि ने उलट दिया है और भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से कहलवाया है 'री मैया मोरी मैंने ही माखन खायो' अर्थात श्रीकृष्ण माँ यशोदा के सामने मान लेते हैं कि हाँ उन्होंने ही गोपियों के घरों पर से मक्खन खाया है।

ख्याति प्राप्त भजन गायक पद्मश्री पुरुषोत्तम दास जलोटा के पुत्र अनूप जलोटा ने एक सवाल के जवाब में बताया कि उन्होंने छह वर्ष की उम्र से ही भजन गायन प्रारंभ कर दिया था और उनके गुरु उनके पिता ही हैं।

27 वर्ष की उम्र में 1980 में उन्हें उनके एलबम भजन संध्या से प्रसिद्धि मिली। पॉलीडोर म्यूजिक कंपनी द्वारा इस एलबम के लिए जारी कैसेट की ऐसी प्रसिद्धि हुई कि अभी भी इस कैसेट की प्रतियाँ बनाकर बाजार में बिक्री के लिए जारी की जाती हैं।

उन्होंने बताया कि उनका पहला एलबम तो वर्ष 1975 में ही जारी हो गया था, लेकिन वह बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ। 1980 में भजन संध्या आने के बाद 'भजन गंगा' एलबम आया और उसके बाद अगले बारह वर्षों में एक के बाद एक उनके लगभग सौ एलबम बाजार में आए जिनमें से पचास के करीब सुपरहिट हुए।

अनेक भाषाओं में भजन गायन का लोहा मनवा चुके अनूप जलोटा का बांग्ला में 1983 में जारी एलबम 'मनो जपो नाम' हिन्दी की भजन संध्या की तरह जबरदस्त लोकप्रिय हुआ।

जलोटा ने हिन्दी और बांग्ला के अलावा मराठी, गुजराती, उड़िया, राजस्थानी, सिंधी, नेपाली, पंजाबी और उर्दू में भी भजन के एलबम बनाए हैं।

हिन्दी में उनके हिट एलबम में 'भजन यात्रा', 'भजन आनंद', आओ भजन गायें' 'भजन तीर्थ', 'भजन प्रभात', 'भजन आरती', 'प्रभु दर्शन' और 'हरि दर्शन' आदि शामिल हैं।

आज भी वे कम से कम सात से आठ घंटा शास्त्रीय संगीत का रियाज कर अपने को निखारने में लगे रहते हैं।
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