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'नदी महोत्सव' में 'नर्मदा'
कहते हैं - संस्कृति की कहानी मनुष्य और नदी की जुगलबंदी की कहानी है। दुनिया की तमाम संस्कृतियों का जन्म नदियों की कोख से हुआ। चिरकुमारी नर्मदा के कूल-किनारे भी तो संस्कृति की महागाथा बाँचते रहे हैं।

नर्मदा की इसी महिमा को इंदौर की यशस्वी नृत्यांगना डॉ. सुचित्रा डाकवाले हरमलकर ने एक सुंदर बैले की शक्ल दी है। 23 से 25 फरवरी तक होशंगाबाद के बान्द्राभान में आयोजित 'नदी महोत्सव' में आए दुनिया भर के पर्यावरणविद्, संस्कृति चिंतक, अन्वेषक और शोधार्थी मध्यप्रदेश की जीवनरेखा, सौंदर्य की नदी नर्मदा की सुनहरी गाथा देख-सुन सकेंगे।

इस जंगी जलसे के संरक्षक अनिल माधव दवे की परिकल्पना को फलक पर उतारने करीब एक दर्जन किरदारों का हुनर काम कर रहा है। संस्कृत तथा हिन्दी काव्य को मुकम्मल धुनों से सँवार रहे हैं ध्रुपद गायक गुंदेचा बंधु।

उमेश तरकसवार, सुलभा केकरे, रंजना चितले और कमल जैन जैसे शिल्पियों का स्पर्श भी इस सृजन को सुग़ढ़ बनाने में अहम होगा। नृत्य-संगीत और अभिनय का यह मिलाजुला रूपक जैसा कि सुचित्रा कहती हैं- 'नर्मदा के प्रति हमारी यह समवेत प्रणति होगी'। (नईदुनिया)
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