आज के अधिकांश युवा अपने प्यार के इजहार के लिए 'वेलेंटाइन डे' की महीनों से प्रतीक्षा करते रहते हैं ताकि अपने दिल की बात इस प्रेम के प्रणय दिवस पर कह दी जाए। हालाँकि इस पर्व को मनाने का खुमार भी ज्यादा पुराना नहीं है। लगभग सात-आठ सालों के भी्तर ही इस प्रेम पर्व ने भारतीय संस्कृति पर भी अपनी गहरी छाप छोड़ दी है।
जब इसे दो दिलों को मिलाने वाला पर्व माना जाता है तो संभव है कि यह दो संस्कृतियों के साथ दो देशों को भी मिलाने का काम कर सकता है!
जी हाँ, शायद प्रेम में वह ताकत होती है जो नफरतों को मिटाकर सरहदों की दूरियाँ भी कम कर सकती है। प्रेम की इसी ताकत को पहचानते हुए वेलेंटाइन डे पर जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों ने एक अनोखी पहल की। इसके तहत उन्होंने अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने की लिए लाल सुर्ख गुलाबों के साथ प्रेम के सैकड़ों संदेश, गुब्बारे और मुँह मीठा करने के लिए मिठाइयाँ तीन नावों द्वारा भेजी गईं। नाव में बंदूकों की बैरलों में गोलियों की जगह फूल भेजे।
वास्तव में घाटी से सरहद पार भेजा प्रेम का यह तोहफा अपने आप में सभी के वेलेंटाइन डे से बिल्कुल अलग और पूरे देश के लिए मिसाल से कम नहीं था...और इस प्रेम के संदेश की वाहक बनी चिनाब नदी। जिसने अपनी स्वच्छंद विचरती धाराओं से यह संदेश सीमा पार अपने पड़ोसी मित्रों को पहुँचाया...!
इस क्षण के गवाह बने कश्मीरी नागरिक, जो इस नई पहल को देखने के लिए चिनाब के पास एकत्रित हुए। जम्मू से 32 किलोमीटर अखनूर क्षेत्र से रवाना की गई इन नावों को चलाने के लिए कोई खेवय्या नहीं था...थी तो सिर्फ चिनाब की लहरें, जो प्रेम के इन संदेशों को अपने पर सवार कर गंतव्य की ओर चलीं...। मोमबत्तियों की रोशनी से जगमगाती रोशनी में जब ये नावें चलीं तो उन्होंने सिद्ध कर दिया कि प्रेम के लिए सरहदें कोई मायने नहीं रखती बल्कि दूरियों को पूरी तरह मिटा देती हैं।
कई राजनीतिक पार्टियों, स्वयंसेवी संगठनों के साथ इस कार्य का मुख्य जिम्मा उठाया था सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ने। जिसकी प्रमुख कश्मीरी मुस्लिम महिला डॉ. द्रक्षा अंद्राबी हैं। डॉ. अंद्राबी श्रीनगर की रहने वाली हैं और उनका संगठन कश्मीरियों की सुख-शांति के लिए पिछले एक अरसे से ऐसे कामों में लिप्त है। सुश्री अंद्राबी ने इस मौके पर कहा कि प्रेम महसूस करने की चीज है इसका कोई मोल नहीं हो सकता इसलिए हमने अपने पड़ोसियों के लिए प्रेम का यह संदेश भेजने की पहल की।
बगैर खेवय्या के चली नावों के डूबने की आशंका पर सुश्री अंद्राबी ने कहा कि प्रेम के संदेश कभी डूबते नहीं हैं...। संदेश भेजने का असली मकसद यही है कि इन फूलों के सद्भाव की खुशबू उस सरजमीं तक जाए ताकि वहाँ बारूद और बंदूक की गंध के बदले सद्भाव और प्यार का संचार हो।
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