वीनू, प्रतीक्षा, देव, बच्चू, गट्टू और तमाम नाम इस फेहरिस्त में जु़ड़ सकते हैं, जो कॉकरोच से डरते हैं। उनके लिए एक खुशखबरी है, देश में कॉकरोच घट रहे हैं। देश के कॉलेजों में डिसेक्शन की प्रक्रिया के लिए कॉकरोच नहीं मिल पा रहे हैं। छात्रों को इनके लिए 50 से 100 गुना ज्यादा पैसे देना पड़ रहे हैं।
तीन साल पहले तक के हालात ये थे कि 100 कॉकरोचों के लिए 15 रु. देना प़ड़ते थे, लेकिन अब 5 से 10 रु. में एक काकरोच आ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि महाविद्यालयों में छात्रों से कहा जा रहा है कि वे अपने स्वयं के कॉकरोच रखें। जहाँ वे रहते हैं, वहीं से लेकर आएँ। महाराष्ट्र में 11वीं के छात्र के लिए कॉकरोच का डिसेक्शन जरूरी है।
दो कारणों से यह कमी आई है। पहली जीव विज्ञान के विद्यार्थियों की संख्या ब़ढ़ी है। पिछले साल करीब 90,000 छात्रों ने यहाँ पर कॉकरोच का डिसेक्शन किया, जबकि 2001 में यह संख्या 52,900 थी। जहाँ तक प्रति छात्र द्वारा कॉकरोच उपयोग की बात है तो 800 छात्रों ने 6500 कॉकरोचों का डिसेक्शन कर संतोषप्रद परिणाम दिया।
एक छात्र को कम से कम तीन कॉकरोचों की जरूरत होती है, परंतु यह संख्या 8 तक पहुँच जाती है। इसके अलावा स्वच्छता के प्रति लोगों में ब़ढ़ी जागरूकता के कारण भी कॉकरोच कम हुए हैं। लोग बाजार से तमाम स्प्रे इनको मारने के लिए ले आते हैं। ऊपर जो नाम गिनाए हैं उन जैसे लोग तो मारने से भी नहीं चूकते।
पेस्ट कंट्रोल ऑफ इंडिया के वाइस प्रेसीडेंट निखिल का कहना है कि करीब-करीब हर घर में इस तरह की चीजें जाती हैं। यह सही है कि कॉकरोच एकत्र करना गंदा कार्य माना जाता है। ड्रेनेज लाइन साफ करने वाले यह कार्य करते हैं और एक कॉकरोच का 7 से 8 रुपए ले रहे हैं। नईदुनिया
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