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ऐतिहासिक नियुक्ति पर सुनवाई
उत्तरप्रदेश में सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे कैबिनेट सचिव शंशाक शेखर सिंह की नियुक्ति को लेकर दायर की गई जनहित याचिका की सुनवाई लगभग पूरी होने को है और संभवतः आगामी 6 फरवरी को उनकी नियुक्ति पर अंतिम निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में लिया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि एडवोकेट शिवप्रकाश शुक्ला ने उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में गत 3 जनवरी, 2008 को एक जनहित याचिका दायर कर कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह की नियुक्ति को चुनौती दी और 13 मई, 2007 को उनकी कैबिनेट सचिव के पद पर हुई नियुक्ति, उन्हें राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष बनाने तथा कैबिनेट मंत्री का पद दिए जाने तथा उनके द्वारा रूल्स ऑफ बिजनेस में संशोधन किए जाने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए 13 मई 2007, 16 मई 2007 एवं 21 मई 2007 को जारी अधिसूचना को निरस्त करते हुए उन्हें कैबिनेट सचिव के पद से हटाने की माँग की है।

16 मई, 2007 को शशांक शेखर सिंह ने एक अधिसूचना जारी कर उप्र रूल्स ऑफ बिजनेस 1975 एवं उप्र सेक्रेटेरियल इन्स्ट्रक्शंस 1982 में संशोधन कर दिया। 21 मई, 2007 को मुख्यमंत्री ने कैबिनेट सचिव को राज्य सचिवालय का प्रशासनिक मुखिया बनाने के आदेश जारी कर दिए।

इन्हीं मुद्दों को लेकर वादी ने न्यायालय में आपत्ति दाखिल करते हुए कहा कि राज्य में गैर संवर्ग के (गैर आईएएस) अधिकारी को कैबिनेट सचिव बनाकर 30 हजार रुपए वेतन प्रदान कर केन्द्रीय कैबिनेट सचिव की तरह दर्जा कैसे दे दिया?

उप्र सरकार की तरफ से विशेष अधिवक्ता राकेश द्विवेदी का पहले तो यही कहना था कि वादी एडवोकेट हैं और कैबिनेट सचिव के पद पर किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति को चुनौती नहीं दे सकता क्योंकि नियुक्ति से उसका कोई हित प्रभावित नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि वादी को सरकार की नियुक्ति विभाग के गोपनीय दस्तावेज कैसे हासिल हुए इससे लगता है कि याचिका दायर करने के पीछे किन्हीं अन्य लोगों का हाथ है।

सरकारी वकील ने इस बात पर भी बल दिया कि यह याचिका जनहित याचिका के दायरे में नही आती। न्यायमूर्तिद्वय ने सरकार से यह जानना चाहा है कि क्या किसी सरकारी सेवक को मंत्री बनाया जा सकता है? उन्होंने उदाहरण देकर सरकार से पूछा, क्या किसी जिले के सीएमओ को उपमंत्री बनाया जा सकता है? क्या किसी गैर संवर्गीय व्यक्ति के अधीन मुख्यसचिव कार्य कर सकता है? क्या कैबिनेट सचिव के पद पर नियुक्ति के लिए नियमानुसार चयन प्रक्रिया का पालन किया गया है?

पायलट से प्रमुख सचिव : देश की आजादी के 6 दशक बाद उप्र में अचानक कैबिनेट सचिव पद सृजित कर दिया गया। इस पद पर एक पायलट से प्रमुख सचिव बने गैर आईएएस व्यक्ति को राज्य का कैबिनेट सचिव बनाया गया।

सर्वोच्च शिखर पर जिस व्यक्ति को बैठाया गया उसने अपनी असीमित शक्तियों का प्रयोग कर याचिका दाखिल करने के समय तक राज्य के विभिन्न विभागों का 36 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक की धनराशि व्यय करने का निर्णय लिया है।
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