वे बदनाम गलियों में पैदा हुई, पली-बढ़ीं लेकिन अपनी माताओं के पेशे को नहीं अपनाया बल्कि फौलादी इरादे के साथ अब उन्होंने समाज में परचम लहराकर उसे नई राह दिखाने की ठानी है कि अब और नहीं।
यह अफसाना नहीं बल्कि हकीकत है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के चतुर्भुज स्थान की तवायफों की बेटियों की। वे इन दिनों नाटकों के माध्यम से समाज को नई राह दिखाने के प्रयास में जुटी हैं।
वेश्यावृत्ति के लिए कभी बदनाम रहे चतुर्भुज स्थान इलाके में रहने वाली तवायफों की बेटियों के इन दस लड़कियों के समूह ने अपनी माँ के पेशे को नहीं अपनाया बल्कि 'परचम' नामक एक स्वयंसेवी संस्था बनाई है, जिसके माध्यम से वे अपने इलाके की वेश्यावृत्ति और नाच-मुजरा करने वाली महिलाओं को जागृत करने तथा उनके प्रति समाज की सोच को बदलने के प्रयास में लगी हैं। इस संगठन की ये लड़कियाँ न सिर्फ वेश्यावृति के धंधे से जुड़ी महिलाओं और उनके बच्चों के कल्याण के लिए पिछले चार वर्ष से प्रयासरत हैं बल्कि इनके प्रति समाज की सोच को बदलने के लिए ये लड़कियाँ देश के विभिन्न भागों में घूम-घूमकर अपने द्वारा तैयार किए गए नाटक के माध्यम से समाज को जागृत कर रही हैं। अपने इसी प्रयास के तहत इस समूह की पाँच लड़कियाँ नसीमा, शबनम, निकहत, रिंकी और सोनी आगामी 5 फरवरी से 15 फरवरी तक तमिलनाडु के मदुरै में आयोजित होने वाले एक राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह में शामिल होने 31 जनवरी को मदुरै के लिए रवाना हुई।
मदुरै के लिए रवाना होने से पूर्व 'परचम' की सचिव नसीमा ने फोन पर बताया कि एकता परिषद नामक एक स्वयंसेवी संगठन के तत्वावधान में सीसी सेंटर नामक संस्था द्वारा राष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक समारोह थियेटर फॉर जस्टिस में अपनी प्रस्तुति देने के लिए उन्हें आमंत्रित किए जाने से वे बहुत प्रसन्न हैं।
नसीमा ने बताया कि इस नाट्य समारोह में वे अपने समूह द्वारा खेले गए नाटकों में से दो प्रमुख नाटक 'एक सही आशियाने की ओर' तथा 'अब और नहीं' नाटकों को प्रस्तुत करेंगी। उन्होंने बताया कि रेड लाइट इलाकों की जिंदगी में किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, साथ ही रंगीनियों और तड़क-भड़क के बीच तवायफों की सिसकती जिंदगी का सच क्या हैं इन्ही सवालों का जवाब तलाशते इन नाटकों का वहाँ मंचन करने वे मदुरै जा रही हैं। वे बताती हैं कि इन नाटकों का वे विगत चार वर्ष के दौरान बिहार के कई जिलों सहित देश के मुंबई दिल्ली तथा कोलकाता के कई स्थानों पर अब तक तीस प्रस्तुतियाँ दे चुकी हैं। नसीमा ने बताया कि उनका नाटक 'एक सही आशियाने की ओर' वर्ष 2002 में चतुभुर्ज स्थान इलाके में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को प्रशासन द्वारा उजाडे़ जाने की घटना पर आधारित है।
उन्होंने बताया कि उस समय इन इलाकों से वेश्यावृत्ति के धंधे में लिप्त महिलाओं से जिला प्रशासन ने पुनर्वास का झूठा वादा कर उन्हें उस जगह से हटाकर न सिर्फ उनकी आजीविका छीन ली थी बल्कि उनके आशियाने को भी उजाड़ दिया जिससे उन्हें और उनके बच्चों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। नसीमा बताती हैं कि उनकी मंडली में शामिल सभी लड़कियाँ बेघर हुई उन्हीं तवायफों और इसी समुदाय की बेटियाँ हैं। वे बताती हैं उन लोगों को वर्ष 2002 में प्रशासन द्वारा उनके आशियाने के उजाड़े जाने की घटना आज भी याद है। बाद में उनके पुनर्वास के लिए सरकार ने कुछ भी नहीं किया। वे बताती हैं कि इस घटना के बाद उन्हें तरह-तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। फिर भी उन्होंने अपनी माँ के पेशे को नहीं अपनाया बल्कि इस समुदाय के लोगों के लिए कुछ कर दिखाने तथा इस समुदाय के प्रति समाज की सोच बदलने की ठानी।
नसीमा बताती हैं कि नाटक में यह दर्शाया गया है कि इस घटना का इन महिलाओं के परिवार और बच्चों पर क्या असर पड़ा और वे सरकार तथा समाज के बारे में क्या सोच रखती हैं।
अपने दूसरे नाटक 'अब और नहीं' के बारे में नसीमा ने बताया कि उनका यह नाटक महिला उत्पीड़न खास तौर से उन महिलाओं पर आधारित है, जिन्हें देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेलकर उनका शोषण किया जाता है।
इसी समूह में शामिल और अपना नाटक प्रस्तुत करने के लिए मदुरै जा रही उन्हीं लड़कियों में से एक निकहत ने बताया कि वे इन नाटकों के जरिये अपनी व्यथा सुनाने वहाँ जा रही हैं। उनका कहना है कि जिस समुदाय से वे आती हैं और खासतौर से लड़की होने के बावजूद जिस परिवेश में रहकर वे लोग यह सब कुछ कर रही हैं, उसे समाज और सरकार द्वारा प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।
वर्ष 1995 में मुजफ्फरपुर की तत्कालीन जिलाधिकरी राजबाला वर्मा ने वेश्यावृति के बदनाम धंधे की दलदल से चतुर्भुज स्थान की तवायफों को निकालने और उन्हें इस पेशे को छोड़कर स्वरोजगार करने तथा समाज की मुख्यधारा जोड़ने के लिए ऑपरेशन 'उजाला' अभियान चलाया था।
जिला प्रशासन के अभियान के बाद भी जब इन महिलाओं ने वेश्यावृत्ति के अपने इस धंधे से तौबा नहीं की तो वर्ष 2002 में तत्कालीन सहायक पुलिस अधीक्षक दीपिका सूरी ने चतुभुर्ज स्थान इलाकों में छापामारी कर वेश्यावृत्ति के धंधे में लिप्त सैकड़ों महिलाओं को इन इलाकों से गिरफ्तार कर लिया था।
गिरफ्तार इन महिलाओं के पुर्नवास की व्यवस्था होने तक उनमें से 48 को कई स्वयंसेवी संगठनों के आश्रमों में डाल दिया गया था तथा कुछ को जेल भेज दिया गया था। जेल से छूटने के बाद इन महिलाओं को फिर उसी जगह से धंधा शुरू करने से रोकने के लिए जिला प्रशासन ने उस पूरे इलाके को उजाड़ दिया था।
चतुर्भुज स्थान से विस्थापित उन्हीं तवायफों की बेटियों का अब अंजुमन भी बदल गया है और मंजिल भी। अब वे अपने समुदाय के लिए कुछ बेहतर करने तथा उनके प्रति समाज की सोच बदलने के लिए एक स्वयंसेवी संगठन बनाकर अपने इस नए प्रयास में लगी हैं।
बिहार की संभवत: यह पहली ऐसी नाट्य मंडली है, जो अपने समुदाय के सच से समाज को वाकिफ कराने और उनकी सोच को बदलने के प्रयास में लगी है। अगली बारी समाज की है।
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