पहले अंतरराष्ट्रीय जनजातीय फिल्म महोत्सव का शुभारंभ शुक्रवार को गाँधी हॉल में प्रसिद्ध अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने किया। जनजातीय फिल्मों के इस तीन दिनी महाकुंभ में समूचे विश्व की आदिवासी संस्कृति की झलक रूपहले पर्दे पर उतरेगी। फिल्मोत्सव में 40 देशों की 69 फिल्मों का प्रदर्शन होगा। आयोजन में अधिकाधिक दर्शक शिरकत करें, इसलिए निःशुल्क प्रवेशपत्र वितरित किए गए हैं।
शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सिन्हा ने कहा कि जनजातीय कला-संस्कृति को अब महत्व देने के साथ-साथ प्रोत्साहन की भी जरूरत है। मप्र सरकार ने इसका बीड़ा उठाया, यह अच्छी बात है। इस सुंदर आयोजन के लिए प्रदेश सरकार बधाई की पात्र है।
इस फिल्म महोत्सव का आयोजन मप्र शासन के उपक्रम 'वन्या' एवं इंडियन इंफोटेनमेंट मीडिया कॉर्पोशन (आईआईएमसी) के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। सिन्हा ने कहा कि आदिवासी अंचल में रहने वाली जनजातियों, उनकी संस्कृति, रीति-रिवाजों से हम लगातार दूर होते जा रहे हैं। इससे भी दुःखद पहलू यह है कि आज 75 प्रतिशत आबादी जो कि गाँवों में रहती है, उस पर मेट्रो सिटी व बड़े शहरों में रहने वाले हम जैसे 25 प्रतिशत लोग हुकूमत चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
जनजातीय जीवन हमारी बुनियाद इस अवसर पर महोत्सव के अन्य मुख्य अतिथि जाने-माने अभिनेता रणधीर कपूर ने कहा कि आदिम समाज के लोग अलग नहीं, हम में से ही हैं। सभ्य समाज का अतीत जनजातीय जीवन ही है। सही मायने में कहा जाए तो अवसर नहीं मिलने के कारण हमारे ये आदिवासी भाई-बहन आगे नहीं आ पाए।
उन्हें दरिद्र न समझें अध्यक्षता करते हुए लोनिवि मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि जनजातीय कला वैश्विक है। आर्थिक स्थिति के आधार पर जनजातीय जीवन को दरिद्र समझने की भूल नहीं करना चाहिए। इससे पूर्व आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि विश्व में ऐसा महोत्सव पहली बार आयोजित हो रहा है।
महोत्सव को इथोपिया के काउंसलर व कार्यक्रम के अतिथि एण्डले, केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के सचिव गौतमबुद्ध मुखर्जी, साउथ इंडिया फिल्म चेम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष एसपी रामानाथन, देवेन्द्र खंडेलवाल ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर महापौर डॉ. उमाशशि शर्मा, विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष मधु वर्मा, विधायक सुश्री उषा ठाकुर, सुदर्शन गुप्ता समेत देश-विदेश की अनेक फिल्मी हस्तियाँ और अन्य गणमान्यजन उपस्थित थे।
देर से ही सही पर किसी ने ध्यान तो दिया भले ही शहरों में खूब चकाचौंध दिखाई देती है, पर हमारे देश और संस्कृति का मूल तो जनजातियाँ ही हैं। देर से ही सही, पर किसी ने उनकी ओर ध्यान तो दिया। उन्हें आगे ब़ढ़ाने की पहल वास्तव में बहुत सराहनीय कदम है और फिल्म इंडस्ट्री को भी इन लोगों के बारे में विचार करना चाहिए। उक्त बात अभिनेत्री रीता भादुड़ी ने कही। वे जनजातीय फिल्म महोत्सव में भाग लेने इंदौर आई थीं।
उन्होंने वर्तमान फिल्मों और धारावाहिकों के बारे में कहा कि यह मार्केटिंग का दौर है। जो बिकता है वही दिखता है। एक्टिंग करना हमारा रोजगार है जो लोग देखना पसंद करते हैं, वही पर्दे पर दिखाया जा रहा है। आज 'तारें जमीं पर' जैसी प्रेरणादायी फिल्में भी बन रही हैं तो मल्लिका शेरावत को भी पसंद किया जाता है। पहले और आज के माहौल के अंतर तो काफी आया है, पर वह स्वीकार करने योग्य है।
बस जरूरत है प्रतिभा को तराशने की 'अमु काका बाबा ना पोरियो रे...' गीत से दुनियाभर में धूम मचाने वाले आनंदीलाल हिन्दी फिल्म सिनेमा में भी किस्मत आजमाना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि इस आयोजन में प्रस्तुति देना उनका ब़ड़ा सौभाग्य है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बहुत प्रतिभा छुपी है बस, उसको तराशने की आवश्यकता है। भले ही उनके आदिवासी गीतों को देशभर के लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है, पर अभी भी हमारी कला के प्रचार का दायरा सीमित है।
हिन्दी सिनेमा की दुनिया के जिन लोगों तक हम अपनी आवाज पहुँचाना चाहते हैं, वह अभी नहीं हो पा रहा है। आदिवासी संगीत को अच्छे स्थान पर देखने का सपना है साथ ही स्वयं हिन्दी फिल्मों के लिए गाने की भी इच्छा रखते हैं आनंदीलाल कहते हैं कि आदिवासी समाज बहुत पिछड़ा हुआ है। ऐसे आयोजनों में तो केवल आकर्षक 'डिस्प्ले' नजर आता है पर वास्तविक स्थिति इससे बहुत अलग है। शासन को आदिवासियों के विकास की दिशा में सशक्त कदम उठाने चाहिए।
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