-दिनकर कुमार वर्ष 1992 से वर्ष 2006 के बीच कुल 4383 उग्रवाद से जुड़ी हिंसक घटनाओं के साथ मणिपुर देश में जम्मू-कश्मीर और असम के बाद उग्रवादी हिंसा से प्रभावित तीसरा प्रमुख राज्य बना हुआ है। वर्ष 2006 में हिंसक वारदातों के मामले में मणिपुर ने असम को भी पीछे छोड़ दिया। असम में जहाँ 242 वारदातें हुईं, वहीं मणिपुर में 311 वारदातें हुईं।
मणिपुर में लोगों को दहशत के साए में जीना पड़ रहा है और इस राज्य में उग्रवादी संगठन सबसे अधिक सुनियोजित तरीके से जबरन धन वसूली अभियान चला रहे हैं। इस अभियान की चपेट में राज्य का लगभग प्रत्येक नागरिक आ चुका है। राज्य सरकार के सारे विभाग मूकदर्शक बने हुए हैं।
मणिपुर में तकरीबन बीस उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। इनमें से कुछ संगठन खुद को राज्य के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के प्रतिनिधि बताते हैं तो कुछ संगठन खुद को नगा, कुफी तथा अन्य जनजातियों के प्रतिनिधि बताते हैं। वर्ष 2006 से फरवरी 2007 की अवधि में विभिन्न उग्रवादी संगठनों के 917 उग्रवादियों को गिरफ्तार किया गया और मुठभेड़ के दौरान 116 उग्रवादियों को मार दिया गया।
उग्रवादी संगठनों की तरफ से चलाए जा रहे धन वसूली अभियान से क्षुब्ध होकर बीच-बीच में लोग विरोध भी जताते रहे हैं। पिछले वर्ष जून महीने में एक उग्रवादी ने 'आल मणिपुर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन' और फार्मेसी मालिकों के संगठन से 'टैक्स' के रूप में एक करोड़ रुपए की माँग की थी। इस माँग के विरोध में दो दिनों तक राज्य की सभी फार्मेसियों को बंद भी रखा गया था।
राज्य में पुलिसकर्मियों की तादाद कम नहीं है। अखिल भारतीय स्तर पर जहाँ एक लाख की आबादी के लिए औसतन 122 पुलिसकर्मी तैनात हैं, वहीं मणिपुर में एक लाख की आबादी के लिए 535 पुलिसकर्मी तैनात हैं। इसके बावजूद राज्य का पुलिस विभाग जनता को उग्रवादियों के कहर से बचा पाने में नाकाम रहा है। जब राज्य भर की फार्मेसियों को बंद रखा गया था, तब पुलिस विभाग ने एक हफ्ते के बाद बल प्रयोग करते हुए फार्मेसियों को खुलवाया था। इस दौरान डॉक्टरों ने जीवन रक्षक दवाओं की किल्लत को देखते हुए कई मरीजों का ऑपरेशन टाल दिया था।
इसी तरह पिछले वर्ष मई महीने में मणिपुर की राजधानी इम्फाल के पाओना बाजार में तस्करी करके लाई गई विदेशी सामग्री बेचने वाले 100 से अधिक दुकानदारों से एक उग्रवादी संगठन ने डेढ़ करोड़ रुपए की माँग की। दुकानदारों ने विरोध जताते हुए 28 मई, 2007 को अपनी दुकानों को बंद रखा। इसके बाद उग्रवादी संगठन और दुकानदारों के बीच कुछ कम राशि देने पर सहमति हो गई और फिर दुकानें खोल दी गईं। एक दूसरी घटना में 23 मई को यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) के उग्रवादियों ने रिलायंस टेलीकॉम के एक इंजीनियर का अपहरण कर लिया गया। चूँकि इंजीनियर ने संगठन को टैक्स के रूप में तीस लाख रुपए नहीं दिए थे।
मणिपुर में सरकारी एजेंसियों के लिए और निजी प्रतिष्ठानों के लिए व्यापार करना आसान नहीं है। भारतीय जीवन बीमा निगम के इम्फाल स्थित कार्यालय को पिछले वर्ष जून महीने में नौ दिनों तक बंद रखना पड़ा था। एक उग्रवादी संगठन ने निगम से बीस लाख रुपए की माँग की थी। इसके बाद न्यू इंडिया इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और नेशनल इंश्योरेंस के इम्फाल स्थित कार्यालयों को भी 'टैक्स' की माँग के चलते बंद रखना पड़ा। बाद में पुलिस की तरफ से सुरक्षा का आश्वासन मिलने के बाद इन कार्यालयों को खोला गया।
राज्य में प्रशासन पूरी तरह पंगु हो चुका है। जितने भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान हैं, वे नियमित रूप से उग्रवादी संगठनों को धन देते रहे हैं। सरकारी फंड के धन का बड़ा हिस्सा भी उग्रवादियों तक पहुँचता रहा है। उग्रवादी संगठन राजनेताओं, सरकारी अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और आम नागरिकों के आवास पर धन नहीं मिलने पर हमले करते रहे हैं।
जबरन धन वसूली के सारे मामले उजागर नहीं हो पाते। मणिपुर पुलिस कह चुकी है कि उग्रवादी संगठन अकसर राज्य से बाहर दूसरे शहरों में शिकार को बुलाकर सौदेबाजी करते हैं और धन लेन-देन भी वहीं कर लिया जाता है। इस तरह की सौदेबाजी मीडिया के जरिए सामने नहीं आ पाती।
पिछले दिनों यूएनएलएफ के महासचिव और वित्तीय प्रभारी एन. मरजीत उर्फ थाबलसिंह को गुवाहाटी में 47 लाख रुपए नकदी, दो लैपटॉप और एक कार के साथ गिरफ्तार किया गया और यह तथ्य उजागर हुआ कि किस तरह उग्रवादी संगठन धन वसूली के लिए सौदेबाजी का काम दूसरे शहरों में करते हैं।
मणिपुर के चंदेल जिले में सीमा पर स्थित मोरे शहर में भारत और म्यांमार के बीच दस अरब रुपए का व्यापार होता है। इम्फाल से मोरे जाने के लिए 109 किमी लंबा राष्ट्रीय उच्च मार्ग संख्या 39 है। इस उच्च मार्ग पर उग्रवादी संगठन जबरन धन वसूली करते हैं। माँगा गया धन नहीं मिलने पर उग्रवादी संगठन हिंसा का सहारा लेते हैं। समय-समय पर बसों और टैक्सियों पर हमले होते रहते हैं।
लगभग एक दशक से नगालैंड के उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आईएम) के साथ केंद्र सरकार ने संघर्ष विराम लागू कर रखा है और शांति प्रक्रिया किसी नतीजे तक नहीं पहुँच पाई है। इस बीच एनएससीएन (आईएम) ने नगालैंड के अलावा मणिपुर के सीमा क्षेत्रों में भी हिंसक गतिविधियाँ तेज कर दी हैं।
राष्ट्रीय उच्च मार्ग 39 और 53 के जरिए असम के साथ मणिपुर का पूरे देश से संपर्क बना हुआ है। राष्ट्रीय उच्च मार्ग 39 इम्फाल को नगालैंड के शहर दीमापुर से जोड़ता है, वहीं राष्ट्रीय उच्च मार्ग 53 इम्फाल को असम के शहर सिलचर से जोड़ता है। दशकों से राष्ट्रीय उच्च मार्ग 39 को एनएससीएन (आईएम) नियंत्रित करता रहा है और उसने 26 स्थायी टैक्स संग्रह चौकियाँ बना रखी हैं।
प्रत्येक व्यावसायिक वाहन को एक बार जाते समय चार हजार रुपए टैक्स के रूप में एनएससीएन (आईएम) को चुकाना पड़ता है। इस तरह अत्यावश्यक चीजों की कीमत दोगुनी हो जाती है। जो वाहन चालक टैक्स नहीं देता हैं, उनके वाहन में आग लगा दी जाती है।
उग्रवादियों के आतंक को देखते हुए सरकार अपनी विवशता को छिपाने के लिए खामोश बनी रहती है। समय-समय पर राजनेता उग्रवादियों से हिंसा बंद करने की अपील करते हैं। इस तरह की अपील का उग्रवादियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
राज्य सरकार की अकर्मण्यता और केंद्र सरकार की उपेक्षा की वजह से राज्य के नागरिक उग्रवादी संगठनों की दया पर जीने के लिए मजबूर हैं। सबसे रोचक तथ्य यह है कि राज्य के किसी भी उग्रवादी संगठन का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है और सभी अपराधियों के गिरोह की तरह काम कर रहे हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य जबरन धन वसूली करना और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में दहशत फैलाना है।
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