आज के दौर में जहाँ एक ओर जनप्रतिनिधियों के बेटे जमकर मजे कर रहे हैं, वहीं कर्पूरी ठाकुर के समय के एक मंत्री का बेटा अखबार बेचकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा है।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की सरकार में तत्कालीन मंत्री मोहनलाल गुप्ता के पुत्र उदय प्रकाश गुप्ता अपनी गरीबी और तंगहाली के कारण अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण अखबार बेचकर कर रहे हैं।
मुजफ्फरपुर के नया टोला निवासी 57 वर्षीय उदय प्रकाश गुप्ता रोज सुबह अखबार लेकर अपनी साईकिल से निकल पड़ते हैं और मुहल्लों में घूम-घूमकर अपने अखबार ग्राहकों के घर पहुँचाते तथा अन्य लोगों से बेचते हैं।
यह बिडम्बना ही है कि मोटर मेकेनिक में आईटीआई के डिप्लोमाधारी उदय प्रकाश ने जब नौकरी चाही तो उन्हें नहीं मिली क्योंकि तब उनके सिद्धान्तवादी पिता ने पैसे और पैरवी का सहारा लेने से इनकार कर दिया।
उदय को अपने बचपन में पिता द्वारा सुनाई गई आजादी की जंग की कई दास्तानें आज भी याद है। उदय बताते हैं कि उनके पिता जो अब जीवित नहीं हैं, बापू के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा ले चुके हैं।
वे बताते है कि नया टोला स्थित उनका पुश्तैनी मकान जहाँ वे अभी भी रहते हैं, में कभी पंडित नेहरु ने सैकड़ों कांग्रेसियों के साथ भोजन किया था। हॉकर उदय प्रकाश गुप्ता के अनुसार उनके पिता मोहन लाल गुप्ता 1967 के मध्यावधि चुनाव में पहली बार मुजफ्फरपुर से जीतकर विधान सभा पहुँचे थे।
उसके बाद वर्ष 1969 में वे कांग्रेस पार्टी से टिकट मिलने पर विधायक बने और बाद में वे कर्पूरी जी की सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गये। कर्पूरी की सरकार में उन्हें खाद्य आपूर्ति राज्य मंत्री बनाया गया था, लेकिन छह महीने बाद ही अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विधानसभा भंग हो गई थी।
उदय ने बताया कि जब वह छोटे थे तभी उनकी माँ सरला देवी का देहांत हो गया। छोटे-छोटे बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी को देखते हुये उनके पिता ने डॉ. शांति गुप्ता से दूसरी शादी की थी। दोनों पत्नियों से कई पुत्र और पुत्रियां है। गुप्ता पहली पत्नी के तीन पुत्र में सबसे छोटे पुत्र हैं जबकि उनके सबसे बडे भाई का देहांत हो चुका है और मंझला भाई एक प्राइवेट नौकरी कर किसी तरह से जीवन यापन कर रहा है।
उदय की सौतेली माँ एक एमबीबीएस डाक्टर है और वे इन लोगों से अलग दूसरे मकान में रहती है। उनके पुत्र शिक्षण कार्य में लगे हैं और वयोवृद्ध हो चुकी डॉ. शांति गुप्ता को ही स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन मिलती है।
उन्होंने बताया कि उन्होंने 1972 में आइटीआई से डिप्लोमा किया और बिहार राज्य पथ परिवहन निगम में नौकरी करने के लिए आवेदन दिया लेकिन डिग्री के साथ व्यावहारिक शर्तों को पूरा नहीं करने के कारण उन्हें नौकरी नहीं मिली।
पूर्व मंत्री पुत्र उदय बतातें हैं कि उनके सिद्धांतवादी पिता ने पैसे और पैरवी का सहारा लेने से स्पष्ट मना किया। पूंजी थी नहीं कि कोई व्यवसाय करते इसलिए एक दो जगह और नौकरी के लिए असफल प्रयास करने के बाद थक हारकर अंतत: 1974 से अखबार बेचने का काम शुरु किया जो आज भी जारी है।
उदय ने बताया कि वे प्रतिदिन 200 से 250 अखबार बेच लेते हैं, जिससे उन्हें तकरीबन 6 हजार रुपये महीने की कमाई हो जाती है और इसी से किसी तरह अपने परिवार का भरण- पोषण चलता है। वे बताते हैं कि उनके परिवार में पत्नी सहित एक पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं जो अभी अविवाहित हैं।
उदय ने बताया कि पेट काटकर किसी तरह वे अपने पुत्र को एमसीए करा रहे हैं। बडी बेटी ने स्नातक कर लिया है और अब उसकी शादी के लिए वे चिंतित हैं जबकि दूसरी ने स्नातक द्विवतीय वर्ष की परीक्षा पास कर ली है।
उदय अखबार बेचने के काम को सम्मान के साथ देखते हैं और वे इसे न सिर्फ अपनी जीविका का साधन मानते हैं बल्कि उन्हें लगता है कि वे इसके साथ समाजसेवा का भी कार्य कर लेते हैं। उनका मानना है कि अखबार जनता की आवाज होती है और उनके अनुसार इस आवाज को जन-जन तक पहुंचाना भी समाजसेवा है।
उदय को सरकार से बत इतनी शिकायत है कि सिद्धांत के साथ अपना जीवन देश और समाज के लिए उत्सर्ग करने वाले सेनानियों के परिवारों के लिए कोई योजनाएं क्यों नहीं बनाती। उनका कहना है कि ऐसे परिवारों को परिवारिक पेंशन एवं अन्य सुविधा देने के लिए सरकार को विचार करना चाहिए।
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