भारत के गरीब किसान और मौज-मस्ती करने वाले अमेरिकियों में एक समानता जरूर है कि दोनों जीवन भर कर्ज के बोझ तले जीवन बिताते हैं। वहाँ के खुलेपन की अपनी पारदर्शिता है तो यहाँ के अनुशासित जीवन की अपनी अदा है। फिर भी यहाँ की शांति और संयमपूर्ण जीवनशैली वहाँ के लोगों को नित आकर्षित करती है।
ऐसी ही कुछ ऐसी ही बातें बता गए अमेरिका से आए डॉ. सुभाष गुप्ता। वे वहाँ पर डेंटिस्ट हैं। 1974 में भारत छो़ड़ दिया था। वहाँ गए, संघर्ष किया और आज खुद का गम कंडीशनर (मसू़ड़ों की औषधि) दुनिया में बेच रहे हैं। यह कोएन्जाइम से बनाया गया है। ब्लूमिंगटन से लेकर मैनचेस्टर के डॉक्टर उनका ये कंडीशनर लोगों को उपचार के लिए देते हैं।
भारतीय समाज में गहरी रुचि रखने वाले डॉ. गुप्ता का कभी इंदौर के जेलरोड पर क्लिनिक हुआ करता था। वे आज मैसाचुसेट्स में रहते हैं। वे बताते हैं कि अमेरिकियों का विश्वास खर्च कर मौज करने में है, लेकिन भारतीय ऐसा नहीं कर पाते।
भारतीय यदि 1000 डॉलर कमाएगा तो 100 डॉलर खर्च कर 900 डॉलर बचा लेते हैं, जबकि अमेरिकी 1000 डॉलर कमाएँगे तो 1100 डॉलर खर्च कर देंगे। यानी वे हमेशा अपना जीवन कर्ज के बोझ में बिता देते हैं। 25 प्रश अमेरिकी कर्ज के बोझ तले जीवन निकाल देते हैं।
यह पूछने पर कि भारत के अध्यात्म की ओर अमेरिकी क्यों आकर्षित होते हैं। डॉ. गुप्ता शांति को इसका मूल कारण मानते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ की शांतिप्रिय जीवनशैली के कारण अमेरिकी आध्यात्मिकता को पसंद करते हैं। वे देखते हैं कि आध्यात्मिक शैली में जीवन कलहपूर्ण नहीं रह जाता है।
बात अमेरिका में प्रॉपर्टी की : जहाँ तक महँगाई की बात है तो 26 साल पहले अमेरिका में मकानों के जो भाव थे, उसमें ज्यादा अंतर नहीं आया। वे बताते हैं कि मान लीजिए 26 साल पहले अमेरिका में यदि कोई मकान 4 लाख डॉलर का था, तो वह अब 6 लाख डॉलर का होगा। परंतु भारत में इन 26 सालों में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। भाव आसमान छू गए हैं।
|