सूरज की पहली किरण के साथ घरों की छतों, चौबारों, छज्जों और दीवारों पर दिखाई देने वाली चीं-चीं करती हलके और गाढ़े भूरे रंगों की छोटी-छोटी चिड़िया गोरैया अब ढूँढे से भी नजर नहीं आती। दरअसल तीव्र शहरीकरण और बढ़ते प्रदूषण के कारण कुदरत के ये नन्हे-नन्हें फरिश्ते विनाश के कगार पर पहुँच गए हैं।
इस बात को ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब ये नर और मादा गोरैया शहरों में काफी तादाद में पाए जाते थे और लोग अपने घरों और बालकनियों में इनके लिए बाजरा और पानी रखा करते थे। सुबह होते ही चीं-चीं के तीव्र शोर के साथ इन चिड़ियों के झुंड बाजरा खाने उतर आते थे और बच्चों से लेकर बड़े बूढ़ों की उमंग इस छोटे आकर्षक पक्षी को देखकर पतंग हो जाया करती थी।
पक्षी विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि अगर यही चलन जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब यह आकर्षक पक्षी गोरैया शहरों से विलुप्त हो जाएगा।
बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के पक्षी विशेषज्ञ मोहम्मद दिलावर ने बताया इस पक्षी के गायब होने का सबसे प्रमुख कारण जबरदस्त विकास कार्य से जुड़ी गतिविधियाँ है जिसके कारण पेड़ और झाड़ियाँ काटी जा रही है। दूसरी ओर बढ़ते प्रदूषण के कारण भी इन पक्षियों के अस्तित्व पर संकट के बादल छा गए हैं।
उन्होंने कहा कि पहले गोरैया काफी संख्या में दिखाई देते थे इसलिए उस समय उनके संरक्षण का प्रश्न कभी नहीं उठा लेकिन अब इन्हें बचाए जाने की जरूरत है।
शहरों में पक्षी प्रेमियों ने हालाँकि अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए हैं। इसके तहत पेड़ों पर काठ के बने छोटे बक्से लगाए गए है जो इन गोरैया के लिए घोंसलों का काम करते हैं। अभी तक इस तरह के लगभग 1000 बक्से पेड़ों पर टाँगे जा चुके हैं।
पक्षी विशेषज्ञ मोहम्मद दिलावर ने बताया मनुष्यों के विस्तार के साथ पूरे विश्व में कई प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। गोरैया इन्हीं में से एक हैं। पेड़ों पर काठ के छोटे-छोटे बक्से लगाना इन्हें बचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
दिलावर ने बताया कि हाल ही में यूरोप में कराए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि यहाँ प्रमुख शहरों में गोरैया की आबादी में 50 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।
उन्होंने बताया कि जबकि लंदन में गोरैया की संख्या में लगभग 90 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। यूरोप में भी गोरैया के संरक्षण के लिए गंभीरतापूर्वक विचार किया जा रहा है।
उन्होंने बताया दुर्भाग्यवश भारत में गोरैया की पहचान एक आम पक्षी के रूप में है और हमारे पास इनकी संख्या के बारे में कोई आँकड़े नहीं हैं।
दिलावर ने बताया कि गोरैयों की संख्या में कमी के पीछे भोजन की कमी एक प्रमुख कारण है। दूसरी ओर फसलों पर कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग के कारण भोजन की कमी हो रही है और इनके घोंसले नष्ट हो रहे हैं।
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