दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि किसी नवविवाहित जोड़े को अपना संबंध विच्छेद करने के लिए सिर्फ 15 दिनों का वैवाहिक संबंध काफी नहीं है।
स्थानीय अदालत ने मामले में एक नौसेना अधिकारी की तलाक की अर्जी को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी है। लेफ्टिनेंट कमांडर की तलाक अपील को खारिज करते हुए अतिरिक्त जिला न्यायाधीश अतुल कुमार गर्ग ने कहा कि पति ने ऐसे कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए हैं, जिससे यह साबित होता हो कि पत्नी ने क्रूरता की है, जिससे वह विवाह के मात्र 15 दिनों बाद अपने संबंध आगे नहीं रख सकते हैं।
न्यायाधीश ने कहा कि नए जोड़े को एक दूसरे के साथ सहज होने के लिए सिर्फ 15 दिनों का वक्त काफी नहीं है। उसमें भी तब जबकि दोनों की दूसरी शादी हुई हो। पति अपनी पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता है और पत्नी साथ रहने की इच्छुक हैं।
न्यायाधीश ने कहा कि एक पखवाड़ा आपसी समझदारी विकसित करने की बजाय विवाह विच्छेद करने संबंधी निर्णय पर पहुँचने के लिए बहुत कम है। अदालत ने इसके लिए हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का हवाला दिया। बाद में पत्नी की अपील पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि दोनों की शादी वर्ष 2002 में 19 सितंबर को हुई थी। एक सामान्य जोड़े की तरह 15 दिनों के दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी स्थापित हुए। पति के साथ रहने की उसकी इच्छा के बावजूद उसे जबरन अलग कर दिया गया। अदालत ने कहा कि मौखिक दोषारोपण के अलावा पति अपनी पत्नी पर लगाए गए आरोपों को साबित करने में कामयाब नहीं रहा। पत्नी के खराब व्यवहार दोस्तों के सामने अपमान करने के आरोपों को साबित करने के लिए वह कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत ने उसकी अपील को खारिज कर दिया।
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