वह अपना रिक्शा लेकर सुबह सवेरे ही रेलवे लाइन का एक चक्कर लगाता है और रेल से गिरकर अथवा कटकर मरने वालों के शव को अपने रिक्शे पर लादकर पोस्टमार्टम के लिए 32 किलोमीटर दूर बिजनौर लाता है। पोस्टमार्टम के बाद शव का अंतिम संस्कार करवाता है और उसका कहना है कि इस सब से उसके मन को सुकून मिलता है।
बिजनौर जिले के नगीना में रहने वाला 31 बरस का वकील अहमद पिछले 12 वर्ष से अपने रिक्शा में शव ढोने का काम कर रहा है। उसे जहाँ भी कोई लावारिस शव मिलता है वह उसे अस्पताल पहुँचाता है।
रिक्शा में लावारिस लाशें ढोना उसकी मजबूरी नहीं बल्कि रोजगार का जरिया है और इसी के दम पर उसका घर बार चलता है।
अहमद का कहना है कि कुछ लोगों को उसका यह काम बुरा लगता है, लेकिन उसे ऐसा करके सुकून मिलता है। उसे लगता है कि खुदा के किसी बंदे को सुपुर्दे खाक करके उसे कुछ तो सवाब मिलेगा।
अहमद ने बताया कि रेलवे लाइन के आसपास या जिले में उसे जहाँ भी कोई लावारिस शव पड़ा मिलता है, वह उसे लेकर सरकारी अस्पताल जाता है। इस काम के बदले में उसे प्रशासन की तरफ से सात सौ रुपए मिलते हैं। इसमें शव के अंतिम संस्कार का खर्च भी शामिल होता है।
पोस्टमार्टम के बाद लावारिस शव को उसके हवाले कर दिया जाता है और वह शव का फोटो खिंचवाता है, ताकि पुलिस को शव की शिनाख्त में आसानी हो। इसके बाद वह धर्म के अनुरूप शव का अंतिम संस्कार करवाता है।
वकील को अपने इस पेशे में कोई दोष नजर नहीं आता। उसका मानना है कि हर वह काम पाक है, जिससे भूखों को पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिले और इस काम से उसके बच्चों की परवरिश होती है। इसके साथ ही उसके मन को जो सुकून मिलता है वह अलग।
उसकी ख्वाहिश है कि उसके बच्चे पढ़ लिखकर बड़े आदमी बनें। वह खुदा से यह दुआ भी करता है कि किसी का कोई अपना कभी लावारिस मौत न मरे।
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