खनिज संसाधनों में संपन्न उड़ीसा के खान का दोहन कर कंपनियाँ तो समृद्ध हो रही है, लेकिन स्थानीय लोग विपन्नता के कगार पर पहुँच रहे हैं।
सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट के एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। रिच लैंड पुअर पीपुलः इज ससटेनेबल माइनिंग पॉसिबल शीर्षक से हुए एक अध्ययन का रिपोर्ट उड़ीसा के राज्यपाल एमसी भंडारे ने जारी की।
365 पृष्ठ की इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि जहाँ-जहाँ खनिजों का दोहन हो रहा है, वहाँ न तो स्थानीय व्यक्तियों को रोजगार मिला है और न ही वहाँ कोई विकास कार्य हुआ है।
सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए इस दावे को खारिज किया कि क्षेत्र के विकास के लिए खनन कार्य आवश्यक है। उन्होंने कहा कि खनिज संसाधनों से भरपूर ये इलाके देश के न्यूनतम विकसित इलाकों में गिने जाते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि खनन कार्य में संलग्न कंपनियाँ सिर्फ अपनी झोली भर रही हैं और स्थानीय विकास को भूल गए हैं।
सुश्री नारायण ने कहा कि उड़ीसा में देश के कुल जंगल का सात प्रतिशत है। पानी के मामले में राज्य अमीर है। यहाँ कुल जल संसाधन का 11 प्रतिशत, 24 प्रतिशत कोयला, 98 प्रतिशत क्रोमाइट और 51 प्रतिशत बॉक्साइट है। इसके बावजूद मानव विकास सूचकांक में उड़ीसा का भारांक मात्र 0.404 है। यह तो केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से भी कम है, जबकि इन राज्यों में बहुत कम खनिज पदार्थों का भंडार है।
उन्होनें याद दिलाया कि सन 1990 के दशक के मध्य से राज्य की प्रति व्यक्ति आय गिर रही है। खनिज पदार्थों में संपन्न माने वाले राज्य के सभी जिले देश के अति पिछड़े 150 जिलों की सूची में शामिल हैं।
लौह अयस्क ही नहीं बल्कि अन्य कीमती खनिज पदार्थों के लिए दुनिया भर में विख्यात क्योंझर जिले के 62 प्रतिशत निवासी और देश की बॉक्साइट राजधानी के रूप में विख्यात कोरापुट जिले के 79 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे निवास कर रहे हैं।
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सन 1950 से 1991 के दौरान औद्योगिक और खनन गतिविधियों के लिए राज्य के 26 लाख लोग विस्थापित हुए पर उनमें से मात्र 25 प्रतिशत लोगों का पुनर्वास किया गया।
देश के सकल घरेलू उत्पाद में खनन क्षेत्र से हुए हर एक प्रतिशत की वृद्धि चार गुने अधिक लोगों को विस्थापित करती है। यही नहीं सन 2006 में खनन के दौरान करीब एक अरब 84 करोड़ टन कचरा निकला, जिसका सही ढंग से निपटान नहीं किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक यहाँ खान विकसित करने, खान से निकले खनिज पदार्थो के लिए शोधन संयंत्र लगाने, परिवहन सुविधाएँ विकसित करने एवं अन्य कार्यों के लिए राज्य के 17 प्रतिशत जंगल काट दिए गए। जंगल कटने के कारण वहाँ रहने वाले करीब पाँच लाख आदिवासी भी दर-दर भटकने को मजबूर हो गए।
उनका कहना है कि राज्य में जल संसाधनों का अनुचित दोहन किया गया। देश की दूसरी सबसे बड़ी नदी ब्राह्मणी में इतना कूड़ा कचरा डाला गया कि इस समय यह देश की सर्वाधिक प्रदूषित 10 नदियों की सूची में शामिल हो गई। इसका भी कारण खनन गतिविधियाँ ही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सन 1999 से 2005 के दौरान राज्य में खनिज पदार्थों के दोहन में तीन गुनी वृद्धि हुई, जबकि रोजगार में 20 प्रतिशत की गिरावट। इसके अलावा खनन गतिविधियों से जमीन की गुणवत्ता बिगड़ी और खेती चौपट हो गई। खनिज की रायल्टी से राज्य का खजाना भरता रहा और स्थानीय विपन्न होते गए।
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