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हिन्दी सिनेमा नायक विहीन-जावेद
मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि भारतीय समाज जिस तेजी से व्यक्तिवादी होता जा रहा है, उसमें फिल्मों के लिए न तो सशक्त कहानी बन सकती है और न ही मजबूत नायक।

अख्तर ने कहा भारतीय समाज तेजी से व्यक्तिवादी होता जा रहा है। अब किसी के पास सामूहिक सपने और महत्वाकांक्षाएँ नहीं बची हैं। हर आदमी अपना हित साधने में लगा है। ऐसे में फिल्म के लिए अच्छी कहानी कैसे मिलेगी।

एसौचेम की ओर से मीडिया और मनोरंजन पर आयोजित विश्व सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध गीतकार ने कहा हमारे समाज में मजबूत किरदार नहीं बचे हैं, ऐसे में फिल्म की कहानी में दमदार पात्र कैसे आएँगे। इसीलिए हिन्दी फिल्मों में कोई दमदार नायक इन दिनों नहीं दिखाई देता।

चार दशक से हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिख रहे अख्तर ने कहा कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं है इससे कहीं ज्यादा है। साहित्य और सिनेमा आम आदमी का इतिहास दर्ज करते हैं। इसमें आम आदमी का दु:ख दर्द सुनाई पड़ता है।

उन्होंने कहा हमारा समाज और फिल्म उद्योग एक अंतर्द्वद्व से गुजर रहा है। हम हल खोजने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा पता नहीं यह उत्तर हम कितनी गंभीरता से खोज रहे हैं।

अख्तर ने कहा कि भारत के समाज के तानेबाने का असर हिन्दी फिल्मों के खलनायक पर भी पड़ा है। उन्होंने कहा चालीस के दशक में जमींदार खलनायक होता था। 50 के दशक में अमीर आदमी या या कहें पूँजीपति खलनायक की शक्ल में आ गया। साठ के दशक में अंडरवर्ल्ड का डॉन या दादा किस्म का आदमी खलनायक बनने लगा।

उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा सत्तर के दशक का यही गुंडा विद्रोह करता हुआ नायक बन गया। 80 के दशक में नेता और पुलिस खलनायक बनी। 90 के दशक में पाकिस्तानी पात्रों को खलनायक के तौर पर पेश किया गया। देश में बढ़ते व्यक्तिवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज हमारी फिल्मों में कोई खलनायक नहीं हैं। हमारे पास नायक भी नहीं हैं।
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