- जवाहरलाल राठौड़ ऐसे लोग बहुत कम ही होते हैं जो सुकर्मों के फलस्वरूप व्यक्ति से ऊपर जीवंत संस्था बन जाते हैं। 'गीता भवन' इंदौर के संस्थापक बाबा बालमुकुंदजी भी ऐसे ही श्रेष्ठ मानव थे, जो व्यक्ति से संस्था बन गए। एक पावन संस्था।
उन्होंने एक ही जीवन में दो जीवन जीने का उदाहरण पेश किया। जब वे एक सर्वसुख भोगी रौबदार पंजाबी व्यवसायी का जीवन त्यागकर विनम्र बाबा बालमुकुंद बने तो इंदौर को आध्यात्मिक चेतना का केंद्र 'गीता भवन' मिल गया।
सेठ बालमुकुंदजी का जन्म सन् 1885 में अभिभाजित भारत के सीमा प्रांत के पेशावर जिले की चारसद्दा तहसील में तंगी नामक ग्राम में सेठ श्यामदास कोहली (खत्री) और श्रीमती लक्ष्मीदेवी कोहली के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ। वे जब 12 वर्ष की अल्प आयु के थे, तभी उनका विवाह उत्मानजई ग्राम की कन्या सुभद्रा के साथ हो गया।
घर के परिसर में ही भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान शिवजी के मंदिर थे। कोहली परिवार सनातन धर्मसभा की कन्या पाठशाला का संचालन भी करता था। इससे यह ज्ञात होता है कि कोहली परिवार धर्मनिष्ठ था और इसी कारण बालमुकुंदजी को जन्म से ही धार्मिक वातावरण मिला था। वे सेठ से वानप्रस्थी बाबा बने।
बालमुकुंदजी के विवाह के मात्र दो वर्ष बाद यानी 14 वर्ष की आयु में पितृ-वियोग की अशुभ घटना घटित हो गई। कोहली परिवार पर संकट के बादल घिर आए। मात्र 20 वर्ष की आयु में बालमुकुंदजी ने अपना कपड़े और गुड़ का व्यापार अलग शुरू किया। खूब परिश्रम किया।
25 वर्ष की आयु में बालमुकुंदजी ने रावलपिंडी आकर कपड़े का थोक व्यापार चलाया। उनका नाम रावलपिंडी के प्रतिष्ठित लोगों में शामिल था। वे न्यायालय में पाँच वर्ष असेसर भी रहे। पेशावर में तो उन्होंने एक बार जिला बोर्ड का चुनाव भी लड़ा और जीते थे।
सेठ बालमुकुंदजी एक बार सप्त सरोवर में सिख संत स्वामी गुरुमुखसिंहजी महाराज के पास एक महीने तक रहे। वे कई बार उत्तरकाशी में स्वामी ब्रह्मप्रकाशजी के साथ महीने-महीने भर तक रहकर सत्संग करते रहते। उन्होंने कनखल (हरिद्वार) में स्वामी चैतन्यदेवजी के सान्निध्य में रहकर 41 दिनों तक मौन साधना की थी। ऐसी कई गतिविधियों से यह सिद्ध होता है कि बालमुकुंदजी का अध्यात्म की ओर रुझान बहुत पहले ही गहरे पैठ चुका था।
देश के विभाजन के समय सेठ बालमुकुंदजी कोहली सपरिवार बड़ी ही कठिन परिस्थितियों में भारत आए थे। 1948 में परिवार इंदौर आ गया। इंदौर में सियागंज की एक दुकान लेकर शकर का थोक व्यापार शुरू किया।
बालमुकुंदजी की मुलाकात 'तृप्ति-मंडल' भीमगौड़ (हरिद्वार) के स्वामी सच्चिदानंदजी से हुई। स्वामीजी की प्रेरणा से बालमुकुंदजी ने अपनी पारंपरिक पोषाक (पठानी लिबास) त्यागने का निश्चय कर लिया। उन्होंने गंगा तट पर पठानी लिबास में अपना फोटो खिंचवाकर लिबास हमेशा के लिए त्याग दिया।
इतना ही नहीं, अँगरेजी फैशन के केश नहीं रखने का निश्चय भी किया। सेठ से बाबा बन जाने की प्रक्रिया यहीं से शुरू हुई। आमिष आहार वे पंजाब में ही त्याग चुके थे। 1952 में बालमुकुंदजी वापस इंदौर आ गए और यहीं अपना गुड़-शकर का कारोबार फिर से संभाला।
वे इंदौर में साउथ तुकोगंज स्थित 'गौरानी निवास' में रहने लगे। वहाँ सत्संग चलता रहता एवं पंजाबी संतों का खूब आवागमन होता रहता था। सत्संगी बढ़ते गए। स्थानाभाव महसूस हुआ तो सेठ बंशीधर अग्रवाल के सहयोग से छावनी स्थित जगन्नाथ नारायण धर्मशाला में सत्संग होने लगा। बालमुकुंदजी कई बार तीर्थाटन के निमित्त प्रवास पर भी जाते-आते रहे।
वे एक बार स्वामी प्रेमानंद (एमए) के साथ श्रीलंका के सत्संग प्रवास पर भी गए और वहाँ दो महीने रहे। 1955 में युवा संत प्रेमानंदजी ने इंदौर में सेठ बंशीधर अग्रवाल के निवास पर ठहरकर 'मानव-प्रेम-मंडल' की स्थापना की तथा बालमुकुंदजी को उसका अध्यक्ष बनाया।
'मानव-प्रेम-मंडल' के तत्वावधान में कई धार्मिक आयोजन और प्रवचन हुए। गीता भवन की स्थापना का यही पूर्वरूप सामने आया। 5 अगस्त 1959 को गीता भवन ट्रस्ट की स्थापना की गई।
यह भी उल्लेखनीय है कि उज्जैन में सिंहस्थ के अवसर पर (1957) में अनेक संतों का शुभागमन इंदौर-उज्जैन में हुआ था। उनमें स्वामी गंगेश्वरानंदजी का आना बहुत अच्छा रहा। उन्होंने बालमुकुंदजी को इंदौर में 'गीता भवन' स्थापना की प्रेरणा दी और इस पावन प्रायोजन की पूर्ति में सहयोगी भूमिका अदा करने हेतु युवा संत प्रेमानंदजी को बालमुकुंदजी के पास कुछ समय रहने का निर्देश दिया।
तदनुसार स्वामी प्रेमानंदजी इंदौर में बालमुकुंदजी के साथ रहे। वे बहुत प्रभावशाली प्रवक्ता थे। उनके प्रवचन के प्रभाव से ही 'गीता भवन' की स्थापना का काम शुरू हुआ। अफसोस की बात है कि उनका युवावस्था में ही देहांत हो गया। 1960 में स्वामी गंगेश्वरानंदजी का पुनः इंदौर शुभागमन हुआ। उस वक्त उन्होंने सेठ बालमुकुंदजी को 'बाबा बालमुकुंद' संबोधन दिया।
हरिद्वार कुंभ के अवसर पर स्वामी गंगेश्वरानंदजी ने ही 'बाबा बालमुकुंद' को गृहस्थ जीवन त्यागने और वानप्रस्थी बन जाने की प्रेरणा दी। इस प्रकार सेठ से रूपांतरित 'बाबा बालमुकुंद' बन गए। उन्होंने परिवार को व्यावसायिक जिम्मेदारी सौंप दी और घर-परिवार से अलग 'गीता भवन' के साथ स्वयं को बाँध लिया। बाबा और 'गीता भवन' दोनों एक दूसरे के पर्याय बन गए।
शुरुआत में बाबाजी के सहयोगी रहे सेठ सीताराम झँवर, श्री शिरुलाल वेद, श्री बंशीधर अग्रवाल, सेठ राधाकिशनजी मुछाल, सेठ बालकिशनजी, सेठ श्रीराम चंडोक तथा साहिब दित्तामलजी आनंद। धीरे-धीरे 'गीता भवन' के सहयोगियों में एनएम व्यास, बाबूलाल बाहेती, रामनारायण शास्त्री, हरिकिशन मुछाल, गणपतराज कथूरिया आदि भी सक्रिय रूप से जुड़ते गए।
बाबा 'गीता भवन' से कभी कुछ नहीं लेते थे। बाबा हमेशा कहते 'गीता भवन' के बारे में कुछ अच्छा कर। मैं गीता भवन के कार्यक्रमों में रुचि लेता और उनके 'प्रेस नोट' लिखकर भिजवाता।
इस प्रकार लीला करते-करते बाबा बालमुकुंद 14 सिदंबर 1982 को 'गीता भवन' में ही ब्रह्मलीन हुए। इंदौर का 'गीता भवन' उनकी महान देन है। 'सर्वधर्म समभाव' बाबा का महामंत्र था। वह 'गीता भवन' में गूँज रहा है अनवरत। (नईदुनिया)
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