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दूल्हे के 'सेहरे' से मौर गायब हुए
पारंपरिक मौर बनाने वाले भुखमरी के कगार पर
शादी के लिए लगन परवान चढ़ने के साथ ही दूल्हों को सजाने के लिए पारंपरिक रुप से बनने वाले मौरों के स्थान पर अब रेशमी और अन्य कपड़ों से बनने वाले रंग बिरंगे सेहरे के बढ़ते चलन ने दफ्ती कागज और प्लास्टिक के खिलौने से मौर बनाने वालों को भुखमरी के कगार पर पहुँचा दिया है।

पूरे बिहार में एक जमाने में जैसे ही शादी की लगन शुरु होती थी पारंपरिक मौर बनाने वालों की चाँदी हो जाती थी। दस या पन्द्रह रुपए की लागत से बनने वाले मौर 100 से लेकर 150 तक बिका करते थे, लेकिन आज यह हालत है कि छोटे से छोटे परिवार से लेकर बड़े से बड़े परिवार तक अपने दूल्हे को न केवल कीमती सेहरा बाँधते हैं बल्कि पुरानी जामा जोड़ी के स्थान पर शेरवानी और चूड़ीदार पाजामा या आधुनिक 'तीन पीस वाला सूट' पहनाना ही ज्यादा पसंद करते हैं।

बदलते फैशन और पुरानी परंपराओं को तिलांजलि देने के चलते अब मौर बनाने वाले कारीगरों को पूरे वर्ष अपने परिवार के लिए दो जून की रोटी भी जुटाना मुश्किल हो रहा है।

बिहार में मौरों की सबसे बड़ी मंडी पटना के मच्छरहटटा की मनिहारी मंडी है, जहाँ शादी की लगन शुरु होते ही एक समय में पूरे राज्य से खुदरा और गाँव के व्यापारी आकर मौर खरीद कर ले जाते थे लेकिन बदले दौर में सेहरे के बढ़ते चलन ने पारंपरिक मौर के कारोबार को न केवल मंदा कर दिया है, बल्कि अब हालत यह है कि कारीगरों को काम के लिए दुकानदारों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है जबकि पहले उनके यहाँ दूल्हों के परिजनों की लाइन लगी रहती थी।

इस सिलसिले में मच्छरहटटा के मौर के दुकानदार शंकर राम ने बताया कि पिछले 30 वर्षो से वह मौर बेचने का काम कर रहे हैं लेकिन अब परंपरागत मौरों की मांग बेहद कम होती जा रही है जिससे उन्होंने अपनी दुकान में अन्य सामान भी बेचना शुरु कर दिया है। मौर बनाने वाले बेहद निराश हो गऐ हैं और उन्हें अब अपना पुराना पेशा छोड़कर दूसरे काम की तलाश में बाहर जाने को मजबूर होना पड रहा है।

एक कारीगर प्रीतम ठाकुर ने उदास चेहरे के साथ बताया कि एक समय में उसे दस हजार रुपये तक एक लगन में मिल जाते थे और महंगाई भी इतनी नहीं थी लेकिन अब मौर बनाने के काम में बहुत लोग आ गए हैं तथा मौरों की बिक्री भी कम हो गई, जिससे घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया है।
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