मुंबई में शुक्रवार को आईबीएन-लोकमत टीवी चैनल के दफ्तर पर 'राजनीतिक गुंडागर्दी' का जो नंगा नाच हुआ, उससे भारतीय लोकतंत्र का सिर शर्म से झुक गया। यह हमला किसी एक चनैल पर नहीं बल्कि समूचे मीडिया जगत पर था।
हालाँकि महाराष्ट्र में यह घटना पहली नहीं है। इससे पहले भी मीडिया पर हमले हुए हैं, लेकिन इस तरह के लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होने से हमलावरों के हौसले टूटने के बजाय बुलंद ही हुए हैं।
शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कभी क्षेत्रवाद के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर हिंसा फैलाकर और राज्य के लोगों को आतंकित कर अपना राजनीतिक कद बढ़ाते रहते हैं। हद तो तब हो गई जब शिवसेना के सांसद और पार्टी मुखपत्र 'सामना' के संपादक (?) संजय राउत ने इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों का शर्मनाक तरीके से बचाव किया।
सवाल यह है कि आखिर इस राजनीतिक गुंडागर्दी का इलाज क्या है? क्या निखिल वागले जैसे पत्रकारों को ऐसे ही आतंकित किया जाता रहेगा? क्या कलम की धार को कुंद करने की नापाक कोशिशों पर अंकुश लग पाएगा? -संपादक