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उच्चतम न्यायालय शुक्रवार को सजायाफ्ता कश्मीरी आतंकवादी की याचिका पर सुनवाई को सहमत हो गया। उसने टाडा के इस प्रावधान पर सवाल उठाए हैं कि किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष स्वीकारोक्ति को साक्ष्य माना जाता है।

सजायाफ्ता आशिक हुसैन फक्तू ने दावा किया कि टाडा की धारा 15 असंवैधानिक है, जिसके तहत ऐसी स्वीकारोक्ति को साक्ष्य माना जाता है। उसने कहा कि ऐसा साक्ष्य पुलिस अधिकारी के दबाव में प्राप्त किया जा सकता है और दावा किया कि इस प्रावधान की वैधता पर विरोधाभासी फैसले हुए हैं।

धारा 15 भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 से बिल्कुल अलग है। धारा 24 के तहत पुलिस अधिकारी के समक्ष स्वीकारोक्ति को अदालत में तब तक स्वीकार नहीं किया जाता, जब तक अन्य साक्ष्यों से इसकी पुष्टि नहीं हो जाए।

न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और मुकुंदकम शर्मा की पीठ ने सीबीआई को नोटिस जारी नहीं किया, लेकिन दोषी के वकील और जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीए खान को दावे की जाँच के लिए विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने को कहा। (भाषा)
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