बैंगलुरु (भाषा), शुक्रवार, 25 सितंबर 2009( 15:57 IST )
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने शुक्रवार को कहा कि चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता भारत के अपने मून इम्पैक्ट प्रोब(एमआईपी) ने लगाया है, जो चंद्रयान एक पर था।
PTI
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पुष्टि की है कि चंद्रमा पर गए पहले भारतीय अंतरिक्ष यान ‘चंद्रयान-1’ ने पृथ्वी के उपग्रह की सतह पर पानी होने का पता लगाया है। चंद्रयान एक पर नासा ने भी अपना एक उपकरण रखा था।
नायर ने बताया चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता लगा कर देश के पहले चंद्र अभियान ने एक महत्वपूर्ण और वास्तविक खोज की है। चंद्रयान एक से अलग हो कर चंद्रमा की सतह पर उतरे एमआईपी ने वहाँ पानी के अंश होने के संकेत ग्रहण किए हैं।
नायर ने कहा बहरहाल वहाँ पानी समुद्र, झील, गारे या बूँद के रूप में नहीं है। इसे आप एकत्र नहीं कर सकते। यह पानी खनिजों और चट्टानों में है। हमें स्पष्ट संकेत मिले हैं कि पानी के अणुओं की तरह हाइड्रॉक्सिल (ओएच) वहाँ सतह पर मौजूद है।
उन्होंने कहा हो सकता है कि यह कम से कम कुछ मिलीमीटर हो। अनुमान से अधिक मात्रा पाई गई है और यह वास्तविक खोज है। भारत के मून इम्पैक्ट प्रोब के अलावा चंद्रयान एक नासा के मून मिनरोलॉजी मैपर (एम-3) को भी ले गया था। एम-3 ने भी वहाँ पानी की मौजूदगी की पुष्टि की है।
नायर ने कहा वे मीडिया की इन खबरों से सहमत नहीं हैं कि चंद्रयान असफल रहा या दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उन्होंने कहा मैंने पहले कहा था कि यह अभियान 95 फीसदी सफल रहा। अब मैं कहता हूँ कि यह 110 फीसदी सफल रहा।
चंद्रयान-1 को पिछले साल 22 अक्टूबर को प्रक्षेपित किया गया था, लेकिन अपने दो साल के निर्धारित जीवनकाल से पहले ही, पिछले माह चंद्रयान-1 यान से इसरो का संपर्क टूट गया।
नायर ने कहा जब मून इम्पैक्ट प्रोब चंद्रमा पर उतरा, उसे करीब 25 मिनट लगे। उसने वहाँ की कुछ तस्वीरें लीं, जिनसे पानी के अणुओं का पता चला। खनिजों का पता लगाने वहाँ भेजे गए अन्य उपकरण एचवाइएस-1 ने भी पानी का पता लगाने में नासा के एम-3 की मदद की।
नायर से पूछा गया कि क्या चंद्रमा की सतह से पानी निकाला जा सकता है, नायर ने कहा हाँ, अगर हम उन्नत प्रौद्योगिकी अपनाएँ तो ऐसा हो सकता है। लेकिन एक टन मिट्टी से हमें केवल आधा लीटर पानी मिल सकता है और यही असली चुनौती है।
इसरो के प्रमुख वैज्ञानिक जेपी गोस्वामी ने बताया कि एमआईपी ने 70 डिग्री से 80 डिग्री अक्षांश पर ध्रुवीय हिस्से की ओर पानी के कण होने के संकेत पाए हैं।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों को इन संकेतों की जानकारी जून में ही मिल गई थी, लेकिन इसका खुलासा करने के लिए वे इंतजार करते रहे, क्योंकि वे चाहते थे कि वैश्विक महत्व की यह जानकारी पहले विज्ञान संबंधी जर्नल में आए।
गोस्वामी ने कहा कि चंद्रयान एक ने कई आँकड़े एकत्र किए हैं। इसरो और नासा में हमारे कम्प्यूटरों में कई सूचनाएँ हैं। इनका विश्लेषण करने में छह माह से तीन साल तक का समय लग सकता है।
चंद्रमा पर पानी की खोज की पुष्टि नासा के कैसिनी यान में लगे 'विजुअल एंड इन्फ्रारेड मैपिंग स्पेक्ट्रोमीटर' ने तथा एपीओएक्सआई यान में लगे ‘हाई रिजोल्यूशन इन्फ्रारेड इमैजिंग स्पेट्रोमीटर’ के आँकड़ों से हुई है। यह खोज भविष्य में चंद्रमा के कई अनसुलझे रहस्यों का का पता लगाने में मददगार साबित हो सकती है।
इस खोज से पता चला है कि चंद्रमा की उस सतह के समीप के हिस्सों में पानी के अणु और हाइड्रोक्सिल हैं, जिस हिस्से में सूर्य की रोशनी पड़ती है, लेकिन उच्च अक्षांशों पर पानी के संकेत अधिक हैं।
नायर ने कहा माना जाता है कि चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों में मौजूद ऑक्सीजन की सूर्य से प्रोटॉन के रूप में उत्सर्जित हाइड्रोजन के साथ क्रिया के फलस्वरूप पानी बन सकता है।
उन्होंने कहा चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। प्राप्त आँकड़ों से संकेत मिलता है कि चंद्रमा पर जीवन नहीं है। नायर ने बताया कि अब इसरो चंद्रयान-द्वितीय मिशन के उद्देश्य में तब्दीली लाएगा। उन्होंने कहा चंद्रयान-द्वितीय परियोजना के साथ विभिन्न पेलोड ले जाने के लिए इसरो को कई प्रस्ताव मिले हैं।