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-वेबदुनिया डेस्
पुणे में एच1एन1 वाइरस यानी स्वाइन फ्लू से प्रभावित एक किशोरी की मौत के बाद समूचे महाराष्ट्र में भारी दहशत का माहौल है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि देशभर में इस बीमारी से मोटे तौर पर छह सौ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं। देश के कई शहरों के स्कूल और कॉलेज इसकी दहशत से बंद हो चुके हैं या स्कूलों में जुकाम, साधारण फ्लू प्रभावित बच्चों को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।

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लोग दहशत में हैं और जुकाम, बुखार होते ही अस्पतालों में लाइन लगाकर खड़े होते जा रहे हैं। सभी जानना चाहते हैं कि कहीं वे भी स्वाइन फ्‍लू के शिकार तो नहीं हो गए हैं। हालाँकि देशभर में इस बीमारी से प्रभाव‍ित लोगों की संख्या बहुत कम है लेकिन दहशत का एक बड़ा कारण है कि इस बीमारी के प्रभावित होने पर जाँच के लिए देश में प्रयोगशालाओं की संख्‍या पर्याप्त नहीं है।

सरकार के सामने मुश्किल यह है कि एक ओर उसे जहाँ इस बीमारी से प्रभावित लोगों का सफलतापूर्वक इलाज करना है वहीं बीमारी से लोगों में फैली दहशत पर भी काबू पाना है। हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुत पहले ही चेता दिया था कि यह बीमारी दुनिया में महामारी के रूप में फैल सकती है लेकिन देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत को देखते हुए बीमारी ने जनता में महामारी से ज्यादा खौफनाक होने का डर घर कर लिया है।

इससे पहले भी देश में बर्ड फ्लू और सार्स की दहशत देखी जा चुकी है। हालाँकि ये बीमारियाँ भौगोलिक रूप से प्रभावित देशों और क्षेत्रों तक ही सीमि‍त थीं लेकिन इनमें भी ‍पश्चिमी देशों के मुकाबलों पूर्वी देशों में मरने वालों की संख्या बहुत कम थी। इस बीमारी के संदर्भ में यह जानकारी देना उचित होगा कि पश्चिमी देशों में जहाँ सैकड़ों की संख्‍या में लोगों की मौत हो गई है वहीं वियतनाम, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका और नीदरलैंड्‍स जैसे देशों में प्रभावित लोगों की संख्या हजारों में थी लेकिन मरने वालों की संख्या केवल एक थी।

महामारी का रूप ले चुके स्वाइन फ्लू के संभावित खतरे को देखते हुए सिम्बियॉसिस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की एक हफ्ते की छुट्टी की घोषणा के बाद जिले के तीन और कॉलेज एक हफ्ते के लिए बंद कर दिए हैं।

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इसी तरह यूनान, पुर्तगाल, इराक, ओमान और बहरीन में लोगों के प्रभावित होने के बाद भी एक भी मौत सामने नहीं आई है। इसका कारण यह हो सकता है कि इन देशों में सूअरों की जनसंख्या बहुत कम होगी लेकिन चीन में फ्लू प्रभावित लोगों की संख्या 2152 और जापान में 200 बताई गई है लेकिन मौत किसी की नहीं हुई है। भारत जैसे देश में जहाँ सैकड़ों लोगों के प्रभावित होने पर एक तेरह वर्षीय लड़की की मौत को बहुत अधिक नहीं माना जा सकता है।

इसका एक कारण यह भी है कि देश में चिकित्सा सुविधाओं और दवाओं की कमी हो सकती है लेकिन ऐसा नहीं है कि जुकाम का प्रत्येक मामला एच1एन1 का मामला हो। हालाँकि यह बहुत अधिक संक्रमण फैलाने वाली बीमारी है जिसके संक्रमण पर रोक लगाने की जरूरत है लेकिन पैनिक रिएक्शन की तो बिलकुल नहीं।

यदि देश में इस बीमारी की जाँच और इलाज के लिए समुचित इंतजाम कर लिया जाता है तो अनावश्यक हड़बड़ी की कोई जरूरत नहीं है और बर्ड फ्लू तथा सार्स की तरह से इस बीमारी पर भी काबू पाया जा सकता है।
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