समलैंगिकता के मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद सरकार समान लिंग के बीच सेक्स संबंधों से जुड़े विवादास्पद कानून के भविष्य पर कोई निर्णय करने में अभी भी सतर्क रुख अपना रही है।
समलैंगिकता पर दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले का विश्लेषण करने के लिए गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने अपने कैबिनेट सहयोगियों विधिमंत्री वीरप्पा मोइली तथा स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के साथ शुक्रवार को बैठक की और इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा की।
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने तीनों मंत्रियों को समलैंगिकता के मुद्दे पर सरकार का रुख तय करने की जिम्मेदारी उस समय सौंपी थी, जब इस मामले में उच्च न्यायालय का फैसला सामने नहीं आया था।
नॉर्थ ब्लॉक में 45 मिनट तक चली बातचीत के बाद गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि बैठक में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर चर्चा की गई और यह निर्णय किया गया कि विधि मंत्रालय इस मुद्दे पर एक नोट तैयार करेगा, जिसके बाद वे इस मामले को देखेंगे।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर हमें बातचीत करने तथा एक रुख अख्तियार करने को कहा गया था, जो मामला अदालत में लंबित है। बहरहाल, जब हमने इस बैठक के लिए तिथि निर्धारित की थी, उस समय हमें यह पता नहीं था कि अदालत का फैसला सामने आने वाला है। चिदंबरम ने कहा कि अब हम अदालत के आदेश पर विचार कर रहे हैं। यह निर्णय धारा 377 के केवल एक पहलू को रेखांकित करता है। इस एक पहलू के अलावा धारा 377 को नहीं छुआ गया है। उन्होंने कहा कि इसको देखते हुए हमने विधि मंत्रालय से अदालती फैसले के आधार पर एक ‘नोट’ तैयार करने को कहा है। इसके बाद हम देखेंगे कि इस फैसले पर क्या कुछ और करने की जरूरत है। बहरहाल, चिदंबरम उच्च न्यायालय के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने से संबंधित प्रश्न को टाल गए। बैठक के बाद विधिमंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि तीनों अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को सौंप देंगे।
उन्होंने कहा कि हमने आज बैठक की और फैसले का विश्लेषण किया। हम रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपेंगे। समझा जाता है कि चिदंबरम और मोइली भादसं के प्रावधानों को वापस लेने के पक्ष में हैं, जबकि आजाद इस मामले को संसद के सुपुर्द करना चाहते हैं।
सरकार ने कल संयत रुख अपनाते हुए अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया के दौरान इस बात का कोई सीधा जवाब नहीं दिया था कि फैसले पर उसका कदम क्या होगा। फैसले पर सरकार के अगले कदम के बारे में पूछे जाने पर मोइली ने कहा था कि हमें फैसले के ब्योरे पर गौर करने की जरूरत है।
इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कल आपसी सहमति से समलैंगिकता को वैध करार देते हुए कहा था कि 149 वर्ष पुराने कानून में समलैंगिकता को आपराधिक मामला बताना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और यह कार्य दंडनीय नहीं है। |