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समलैंगिकता : घटनाक्रम एक नजर
समलैंगिकता को लेकर आठ साल तक लड़ी गई कानूनी लड़ाई का घटनाक्रम इस प्रकार है-
2001 : समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले नाज फाउंडेशन ने जनहित याचिका दायर कर माँग की कि वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को वैध किया जाए।

2 सितंबर 2004 : दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की माँग की गई थी ।

सितंबर 2004 : समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने समीक्षा याचिका दायर की।

3 नवम्बर 2004 : उच्च न्यायालय ने समीक्षा याचिका खारिज की।

दिसंबर 2004 : समलिंगी कार्यकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।

3 अप्रैल 2006 : उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय को मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

4 अक्टूबर 2006 : उच्च न्यायालय ने भाजपा नेता बीपी सिंघल की याचिका स्वीकार की, जिसमें उन्होंने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने का विरोध किया।

18 सितंबर 2008 : केंद्र ने गृहमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के बीच मतभेदों के चलते इस मुद्दे पर कोई कदम उठाने के लिए और समय माँगा। अदालत ने आग्रह खारिज किया और अंतिम सुनवाई शुरू हुई।

25 सितंबर 2008 : समलैंगिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि नैतिकता के नाम पर सरकार समानता के मौलिक अधिकार से उन्हें वंचित नहीं कर सकती।

26 सितंबर 2008 : समलैंगिकता पर स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय द्वारा परस्पर विरोधी हलफनामे दायर किए जाने पर उच्च न्यायालय ने केंद्र की खिंचाई की ।

26 सितंबर 2008 : केंद्र ने कहा कि समलैंगिकता अनैतिक है और इसे अपराध की श्रेणी से बाहर किए जाने से समाज का नैतिक पतन होगा।

15 अक्टूबर 2008 : उच्च न्यायालय ने समलैंगिक संबंधों को प्रतिबंधित करने के लिए धार्मिक मान्यताओं को मानने पर केंद्र की खिंचाई की और कहा कि वह इसे उचित ठहराने के लिए वैज्ञानिक नजरिया पेश करे।

नवम्बर 2008 : सरकार ने उच्च न्यायालय के समक्ष कहा कि न्यायपालिका को मामले में हस्तक्षेप करने में संयम बरतना चाहिए, क्योंकि इस पर संसद फैसला करेगी।

सात नवम्बर 2008 : उच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा।

दो जुलाई 2009 : उच्च न्यायालय ने वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को वैध घोषित किया।
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