आपसी रजामंदी से वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को वैध करार देने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले की मुख्य बातें इस प्रकार हैं- -आपसी रजामंदी से दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
-धारा 377 के दंडात्मक प्रावधान नन कंसेंसुअल, पेनाइल, नन वेजाइनल सेक्स और नाबालिगों के साथ पेनाइल नन वेजाइनल सेक्स के मामले में जारी रहेंगे।
-धारा 377 एक समलैंगिक व्यक्ति को उसके पूर्ण व्यक्तित्व के अधिकार से वंचित करता है।
-18 साल से कम उम्र का व्यक्ति इस तरह के यौन संबंधों के लिए सहमति नहीं दे सकता।
-वयस्क का मतलब है 18 साल या उससे अधिक उम्र का व्यक्ति।
-आपसी रजामंदी से दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध नहीं बताने वाला फैसला पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होगा।
-लैंगिक तरजीह के आधार पर कोई भी भेदभाव समानता के खिलाफ है और यह फैसला समानता को मान्यता है, जो व्यक्ति की गरिमा को बढ़ावा देगा।
-धारा 377 के प्रावधान संवैधानिक मूल्यों और मानवीय गरिमा की धारणाओं के खिलाफ हैं, जिन्हें हमारे संविधान का आधारस्तंभ समझा जाता है। |