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149 साल पुराना है समलैंगिकता विरोधी कानून
समलैंगिकता के खिलाफ कानून 149 साल पुराना है, जब लार्ड मैकाले ने भारतीय दंड संहिता में धारा 377 का प्रावधान किया था। इसके तहत 'कार्नल इंटरकोर्स' को प्रकृति के खिलाफ बताते हुए इसे दंडनीय घोषित किया गया था।

धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी स्वेच्छा से प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ किसी पुरुष, महिला या पशु से कार्नल इंटरकोर्स करेगा, उसे आजीवन कारावास या दस साल तक के कारावास और जुर्माना की भी सजा सुनाई जा सकती है।

भारतीय दंड संहिता के इस प्रावधान को आम तौर पर ‘दुराचार निरोधी कानून’ के नाम से जाना जाता है। धारा 377 में वर्ष 1935 में पहली बार संशोधन किया गया, जब विधि निर्माताओं ने इसका दायरा बढ़ाकर इसमें ओरल सेक्स को भी शामिल कर दिया। वर्ष 1884 में यह एनल सेक्स तक ही सीमित था।

वर्तमान भारत में न्यायालयों ने अपने कुछ फैसलों के जरिये इसके दायरे को व्यापक करते हुए इसमें थाइ सेक्स को भी शामिल कर लिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसले में दो वयस्कों के बीच रजामंदी से समलैंगिक यौन संबंधों को वैध करार दिया।

अदालत ने कहा कि समलैंगिक संबंधों को अपराध बताने वाला कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। हालाँकि बगैर आपसी रजामंदी के समलैंगिक संबंध और नन वेजाइनल सेक्स पर धारा 377 के तहत प्रावधान अब भी लागू रहेंगे।

इस विवादास्पद कानून से संबंधित पहला मामला अविभाजित भारत में वर्ष 1925 में खानू बनाम सम्राट के मामले में सामने आया था। उस मामले में यह फैसला दिया गया कि यौन संबंधों का उद्देश्य संतानोत्पत्ति है, लेकिन ओरल इंटरकोर्स में यह असंभव है।
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