स्थापित सामाजिक मान्यताओं से हटकर एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को वयस्कों के बीच सहमति से बनाए जाने वाले समलैंगिक संबंधों को वैध घोषित कर दिया और कहा कि इसे अपराध बताने वाला कानून मौलिक अधिकारों का हनन है।हालाँकि समलैंगिकता को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 असहमति और अप्राकृतिक यौन संबंधों के मामले में जारी रहेगी।मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एपी शाह और न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर की पीठ ने कहा कि जहाँ तक वयस्कों में सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को धारा 377 के तहत अपराध ठहराए जाने की बात है तो यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 15 का उल्लंघन है।उच्च न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 का प्रावधान असहमति से बने समलैंगिक संबंधों और अप्राकृतिक यौन संबंधों तथा ऐसे संबंधों के मामले में जारी रहेगी, जिनमें नाबालिग शामिल हों। अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा कि वयस्क से हमारा मतलब 18 साल या इससे अधिक उम्र का व्यक्ति है। फैसले में कहा गया कि जब तक संसद कानून में संशोधन करके इस आशय का प्रावधान नहीं करती तब तक यह फैसला प्रभावी रहेगा। अदालत ने कहा कि हमारे विचार में भारतीय संवैधानिक कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि वैधानिक आपराधिक कानून समलैंगिकों और उभयलिंगियों के संबंध में फैली गलतफहमियों से बँधा रहे।पीठ ने 105 पृष्ठ के फैसले में कहा कि यह नहीं भुलाया जाना चाहिए कि भेदभाव समानता के खिलाफ है और यह फैसला समानता को मान्यता देता है जो हर व्यक्ति को एक गरिमा प्रदान करेगा।149 साल पुराना है समलैंगिकता विरोधी कानून |