पद्मश्री अलंकरण के लिए चुने गए नईदुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी है। सात सितंबर 1952 को मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में जन्मे आलोक मेहता पिछले करीब चालीस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 1969-70 में इंदौर में नईदुनिया से ही हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में समाचार एजेंसी हिंदुस्तान समाचार और हिंदी साप्ताहिक हिंदुस्तान में कार्य किया। फिर 1979-82 तक जर्मनी में वॉयस ऑफ जर्मनी की हिंदी सेवा के संपादक रहे। जर्मनी से लौटने के बाद श्री मेहता हिंदी साप्ताहिक दिनमान और फिर नवभारत टाइम्स दिल्ली में विशेष संवाददाता रहे।1988-91 तक श्री मेहता नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण के स्थानीय संपादक रहे। 1991-93 तक वे नवभारत टाइम्स दिल्ली में समाचार सेवा के संपादक रहने के बाद 1994 में हिंदी दैनिक हिंदुस्तान दिल्ली के कार्यकारी संपादक बने और वर्ष 2000 तक इस पद पर रहे। इसके बाद वे 2002 तक हिंदी दैनिक भास्कर समूह के संपादक रहे। 2002 में आउटलुक समूह ने अपनी हिंदी पत्रिका आउटलुक साप्ताहिक का प्रकाशन श्री मेहता के संपादन में शुरू किया। छह वर्ष से ज्यादा समय तक आउटलुक साप्ताहिक को हिंदी की लोकप्रिय समाचार पत्रिका बनाने के बाद जुलाई 2008 में आलोक मेहता ने नईदुनिया समूह के प्रधान संपादक का दायित्व संभाला और नईदुनिया के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली संस्करण का प्रकाशन शुरू किया। हाल ही में श्री मेहता के नेतृत्व में नईदुनिया के रविवारीय संस्करण संडे नईदुनिया के लखनऊ, देहरादून, पटना, चंडीगढ़ और जयपुर संस्करण भी शुरू किए गए हैं।श्री मेहता ने प्रिंट पत्रकारिता के साथ-साथ टेलीविजन और रेडियो के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर अपनी अलग पहचान बनाई है। दूरदर्शन, आकाशवाणी और अन्य टीवी चैनलों पर समसामयिक विषयों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में उन्हें अकसर देखा और सुना जाता है। अपनी बेबाक टिप्पणियों, राजनीतिक विश्लेषणों, संपादकीय लेखों, सामाजिक सरोकारों के लिए श्री मेहता की एक विशिष्ट पहचान है।उन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के साथ व कई अन्य प्रतिनिधिमंडलों में शामिल होकर विदेश जाने का अवसर भी कई बार मिला है। वे 35 से ज्यादा देशों की यात्राएँ कर चुके हैं। | | यह दरअसल राजेंद्र माथुरजी, राहुलजी, अभयजी और मनोहर श्याम जोशी जैसे वरिष्ठ साथियों से पत्रकारिता व साहित्य में जो सीखा, उस परंपरा का सम्मान है |
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पत्रकारिता, पर्यटन, कविता, कहानियों और समसामयिक विषयों पर उनकी करीब एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें नामी चेहरे-यादगार मुलाकातें, पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा, भारतीय पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्म-कीपिंग इट क्लीन, सफर सुहाना दुनिया का, तब और अब, चिड़िया फिर नहीं चहकी (कहानी संग्रह), भारत में पत्रकारिता, राइन के किनारे, स्मृतियाँ ही स्मृतियाँ, राव के बाद कौन, आस्था का आँगन, सिंहासन का न्याय, अफगानिस्तान-बदलते चेहरे प्रमुख हैं।पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में श्री मेहता के योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान, राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार-1993, इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान-1995, पत्रकारिता में उत्कृष्ट सम्मान-1995, राष्ट्रीय तुलसी सम्मान-1996, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पत्रकारिता भूषण सम्मान-2006 और हल्दी घाटी सम्मान-2007 से सम्मानित किया जा चुका है। श्री मेहता एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके हैं।इसके अलावा वे नेशनल बुक ट्रस्ट, राजा राममोहन राय फाउंडेशन पुस्तकालय कोलकाता के न्यासी और भारतीय प्रेस परिषद, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, वर्ल्ड मीडिया एसोसिएशन वॉशिंगटन, भारत सरकार की शिक्षा नीति समिति, इंडिया नेशनल कमीशन फॉर को-ऑपरेशन विद यूनेस्को आदि संस्थाओं से भी जुड़े रहे हैं। |