किसी भी मामले पर मुँह भर-भरकर बयान देने वाले देश के राजनीतिज्ञ मुंबई हमलों पर ऊल जलूल बयानबाजी के कारण चारों तरफ से आलोचना झेल रहे हैं। जनता की नजरों में राजनीतिज्ञों की बयानबाजी की बीमारी की इतनी छिछालेदर इससे पहले कभी नहीं हुई।
राजनीतिज्ञों की बयानबाजी की बीमारी ने जहाँ उन्हें तीव्र आलोचना का शिकार बनाया, वहीं जानी-मानी हस्तियों ने सलाह दी है कि बोलने से पहले उन्हें सोचना चाहिए।
केरल के मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन की कुत्ते वाली टिप्पणी हो या महाराष्ट्र के पूर्व उप-मुख्यमंत्री आरआर पाटिल का फिल्मी अंदाज वाला बयान हो या भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्त्यार अब्बास नकवी की लिपस्टिक वाली टिप्पणी हो। उनकी पार्टियों ने उन्हें अपवाद स्वरूप लिया है, जबकि जनता इन पर तीखी प्रतिक्रिया जता रही है।
भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी सामाजिक कार्यकर्ता किरण बेदी कहती हैं राजनीतिज्ञों की बयानबाजी का सिलसिला लंबे समय से जारी है। लेकिन मीडिया धन्यवाद का पात्र है कि अब यह बीमारी उजागर हो रही है। देश में बदलाव की जरूरत है।
जानेमाने इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं कि राजनीतिज्ञों के लापरवाहीपूर्ण रवैये के कारण मुंबई हमलों के बाद लोगों का गुस्सा अनियंत्रित हो गया। |