उच्चतम न्यायालय ने वैवाहिक संबंधों के विवाद में शामिल दंपतियों के बच्चों के प्रति सहानुभूति जताते हुए बुधवार को कहा कि शादी जैसे पवित्र बंधन को समाप्त करने का निर्णय अंतिम उपाय होना चाहिए।
न्यायालय ने यह भी कहा कि तलाक विवाह जैसे पवित्र बंधन को नष्ट कर रहा है और तलाकशुदा माता-पिता के बच्चों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है।
एक स्कूल शिक्षिका को उनके नाबालिग बच्चे की जिम्मेदारी सौंपते हुए शीर्ष अदालत ने इस बात पर अफसोस जताया कि हिंदू विवाह कानून पति और उनकी पत्नी को एकजुट रखने के बजाय पारिवारिक व्यवस्था को नष्ट कर रहा है। बच्चा अब तक अपने पिता के साथ रह रहा था।
न्यायालय के इस फैसले से सुमेधा नागपाल का नौ साल से चल रहा संघर्ष समाप्त हो गया है। सुमेधा ने बाद में न्यायालय को धन्यवाद दिया और कहा यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है और मुझे लगता है कि देशभर की सभी माताएँ मेरे साथ ऐसा ही अनुभव करेंगी।
इससे पहले न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत और न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की पीठ ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि अगर विवाह जैसे पवित्र बंधन स्वर्ग में बनते हैं तो वैवाहिक संबंध नरक क्यों बन जाते हैं। पीठ ने कहा कि उस संवादहीनता को दूर करने और सुलह के लिए हरसंभव प्रयास किए जाने चाहिए, जिससे विवाह जैसे पवित्र रिश्ते में अवांछनीय स्थिति पैदा होती है।
न्यायाधीश पसायत ने अपने फैसले में कहा कि लोग वैवाहिक बंधन तोड़ने के लिए अदालत आते हैं। उन्हें अंतिम उपाय के रूप में ही यहाँ आना चाहिए। अदालतों को सुलह कराने की कोशिश करना चाहिए। विवाह को बचाने पर जोर होना चाहिए न कि उसे तोड़ने पर। |