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विदेशों में भी आराध्य हैं धनदेवी
प्रकाश पर्व दीपावली पर विशेष
दीपावली जैसे वार्षिक त्योहार पर विधि-विधान से लक्ष्मी पूजन की भारत में परंपरा रही है, लेकिन दुनिया में अन्य देश भी हैं, जहाँ धन सम्पदा की देवी की उपासना होती है।

भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई। उपनिषदों में लक्ष्मी को प्रजापति ब्रह्मा की पुत्री बताया गया है। एक अन्य पुरा कथा के अनुसार लक्ष्मी भृगु ऋषि‍ और उनकी पत्नी ख्याति की संतान हैं, इसीलिए उन्हें भार्गवी भी कहा जाता है।

राष्ट्रीय राजधानी स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय के निदेशक डॉ. आरआरएस चौहान ने लक्ष्मी के महत्व के बारे में बताया कि पूरे भारत में इस देवी की आराधना किसी न किसी रूप में की जाती है, जिनके 108 नाम हैं।

उन्होंने कहा कि दक्षिण पूर्व एशिया सहित दुनिया के तमाम देशों में धन की देवी के प्रमाण मिले हैं। काशी के आचार्य डॉ. कामेश्वर उपाध्याय ने कहा कि भारतीय ग्रंथों के अनुसार धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य माना जाता है।

लक्ष्मी का वाहन वैसे तो भारतीय परंपरा में उल्लू माना जाता है, लेकिन भारतीय ग्रंथों में ही इनके कुछ अन्य वाहनों का उल्लेख है। महालक्ष्मी सोस्त में गरूड़ को इनका वाहन बताया गया है, जबकि अथर्ववेद के वैवर्त में हाथी को लक्ष्मी का वाहन कहा गया है।

प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू है, लेकिन प्राचीन यूनान में धन संपदा की देवी के तौर पर पूजी जाने वाली हेरा का वाहन मयूर है।

लक्ष्मी पूजन के बारे में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य उपाध्याय ने कहा कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार लक्ष्मी का पूजन सर्वप्रथम नारायण ने किया। बाद में ब्रह्मा फिर शिव समुद्र मंथन के समय विष्णु उसके बाद मनु और नाग तथा अंत में मनुष्यों ने लक्ष्मी पूजन शुरू किया। उत्तर वैदिक काल से ही लक्ष्मी पूजन होता रहा है।

डॉ. उपाध्याय ने बताया कि लक्ष्मी पूजन के कुछ पुरातात्विक प्रमाण भी मिले हैं। कंबोडिया में मिली विष्णु की मूर्ति में विष्णु शेषनाग पर शयन कर रहे हैं और एक महिला उनके पैर दबा रही है, जो लक्ष्मी हैं।

कंबोडिया में लक्ष्मी की एक काँसे की प्रतिमा मिली है। यूनानी सिक्कों पर लक्ष्मी की प्रतिमा उत्कीर्ण पाई गई है। रोम के लम्पकस से प्राप्त चाँदी की थाली पर लक्ष्मी की प्रतिमा मिली है।

श्रीलंका के पोलेरूमा में खुदाई के दौरान अन्य भारतीय देवी-देवताओं के साथ-साथ लक्ष्मी की मूर्ति भी पाई गई थी। मध्य एशिया में भी ऐसे अवशेष पाए गए हैं, जिनसे लक्ष्मी पूजन को बल मिलता है।

उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में प्रकृति पूजन और देवी देवताओं का पूजन प्राचीन काल से होता रहा है। उनके अनुसार यूरोप में तीन सौ देवियों की पूजा का उल्लेख आता है। लक्ष्मी की पूजा नेपाल, थाइलैंड, जावा, सुमात्रा, मॉरिशस, गयाना, दक्षिण अफ्रीका, जापान आदि देशों में धन की देवी के रूप में अलग-अलग नामों से होती है।

जयपुर से प्रकाशित ज्योतिष सागर पत्रिका के प्रधान संपादक अवनीश पांडेय ने इस बारे में बताया कि ऋग वेद का श्रीसुक्त लक्ष्मी को समर्पित है। उन्होंने कहा कि इस प्राचीनतम वेद में श्री और श्रिये का बार-बार उल्लेख है। उन्होंने कहा कि सामवेद और यजुर्वेद में भी बार-बार श्री शब्द का उल्लेख है।

पांडेय ने कहा कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी लक्ष्मी के पूजन की परम्परा है। उन्होंने कहा कि ग्रीस में श्री को धन देवी माना गया है। यूनान में दिमितर की पूजा ग्राम्य लक्ष्मी के रूप में की जाती थी और इसके पीछे मान्यता यह थी कि इस देवी के पूजन से अकाल नहीं पड़ता।

प्राचीन यूनान में मयूर वाहिनी हेरा की पूजा इस विश्वास से की जाती थी कि इससे धन धान्य की कमी नहीं होती। प्राचीन यूनान में ही प्रकाश की देवी के तौर पर सेरेस की पूजा होती थी जो भारत की लक्ष्मी से ही मिलती जुलती देवी है।

उन्होंने बताया कि एथेन्स में एथेना रोम में वेस्‍ता इटली में इलेक्‍ट्रा आदि नामों वाली देवियाँ दरअसल भारतीय लक्ष्मी की ही पर्याय हैं।

डॉ. उपाध्याय ने कहा कि भारत में जिस प्रकार महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती का धार्मिक महत्व है उसी प्रकार यूरोप में एथेना, मिनर्वा और एलोरा देवियाँ हैं।

जापानी मान्यताओं के अनुसार वहाँ धन समृद्धि के प्रतीक होतेई और दाइकोकु हैं, जो क्रमश: समृद्धि और धन के देवता हैं। प्राचीन रोम में देवी फार्चूना को धन संपदा की देवी माना जाता था। ग्रीक परम्परा में दमित्री की धन की देवी के तौर पर मान्यता थी।
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