आम लोगों के हाथों में अकसर दिखाई देने वाली प्लास्टिक की थैलियाँ अब लोगों की नजर से गायब हो जाएँगी। स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक तथा पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव डालने वाली पॉलीथिन के प्रयोग पर पाबंदी के लिए सरकार ने कानून में संशोधन किया है।
केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अधीन प्लास्टिक निर्माण ब्रिकी और प्रयोग नियम 1999 को अधिसूचित किया है। इसमें 2003 में संशोधित किया गया था। इन नियमों के अनुसार नवीन अथवा पुनर्चक्रित प्लास्टिक से बने ऐसे थैलों तथा थैलियों के निर्माण, भंडारण, वितरण या बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
सरकार ने ये नियम पुनर्चक्रित प्लास्टिक की थैलियों और खाने की चीजों के भंडारण, लाने ले जाने या पैकिंग के लिए प्रयोग पर भी पाबंदी लगाई है। हिमाचल प्रदेश राज्य ने 70 माइक्रोन से कम मोटाई की गैरजैविक सामग्री और 18 गुणा 12 इंच से कम आकार की प्लास्टिक की थैलियों के निर्माण, प्रयोग, भंडारण और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है।
पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार गुजरात, उड़ीसा और गोवा राज्यों के विशिष्ट धार्मिक और पर्यटन स्थलों जैसे गुजरात में अम्बाजी, डाकोर, सोमनाथ और उड़ीसा में कोणार्क और पुरी नगर पालिका क्षेत्र में प्लास्टिक की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। सूत्रों ने कहा संम्बद्ध राज्य सरकारें और संघशासित प्रशासन इन नियमों को अमल में लाने पर नजर रखे हुए है। पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों ने बुधवार को यहाँ कहा कि नवीन प्लास्टिक से थैलियों आदि बनाने के लिए ईकाइयों का उत्पादन शुरू करने से पहले संबद्ध राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा प्रदूषण नियंत्रण समिति में पंजीकरण कराना होगा।
सूत्रों के अनुसार सरकार ने प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाली क्षति का आकलन करने के लिए कदम उठाया है। मुंबई स्थित इंडियन सेंटर फॉर प्लास्टिक इन द एन्वायर्नमेन्ट और रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के स्वायत्तशासी संस्थान चेन्नई स्थित सेंटरल इंस्टीटयूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी ने 2003 में एक प्रबंध प्रकाशित किया था।
इस प्रबंध में सामग्री के रूप में प्लास्टिक के टिकाऊपन और पर्यावरण पर उनका प्रभाव संबंधी विषयों का विस्तार से आकलन किया गया है।
प्रबंध में इस विषय पर किए गए आकलन में कहा गया है कि प्लास्टिक सामान्य रूप से रासायनिक तौर पर निष्क्रिय होता है, तथापि प्लास्टिक को लापरवाही से इधर-उधर फेंक देने और पर्यावरण की दृष्टि से असुरक्षित रूप से फिर से काम में लाने का पर्यावरण और स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने की क्षमता है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड़ों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, केरल, मेघालय और गोवा जैसे राज्यों ने प्लास्टिक की थैलियों की मोटाई के बारे में निर्धारित से अधिक मोटाई के माइक्रोन का पालन करने के कड़े नियम बनाए हैं। |