-सुनंदा राव भारत के कई देशों के साथ हो रहे परमाणु करार से सरकार फूले नहीं समा रही है, लेकिन जहाँ परमाणु रिएक्टरों में पैदा होने वाली बिजली से ऊर्जा की बढ़ती माँग को पूरा किया जा सकेगा, वहीं चिंता यह है कि परमाणु कचरे का प्रबंधन कैसे होगा। ग्रीन पीस संस्था कई वर्षों से इसके खिलाफ आवा उठाती आई है। उसका मानना है कि भारत में परमाणु रिएक्टर बनने से फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा।
न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया का कहना है कि डील के बाद भारत को वर्ष 2020 तक परमाणु रिएक्टरों और ईंधन के आयात के जरिये 25 हजार मेगावाट की अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने में मदद मिलेगी। अभी यह क्षमता मौजूदा 17 रिएक्टरों में मिलाकर महज चार हजार मेगावाट है। इसमें पंद्रह छोटे और दो मध्यम आकार के रिएक्टर हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी नई क्षमता इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विकसित करना होगी।
कुल तीन हजार मेगावाट से ज्यादा क्षमता वाले छह और रिएक्टर इस समय निर्माणाधीन हैं। इनमें दो बड़े और एक फास्ट ब्रीडिंग रिएक्टर शामिल है। इस तरह भारत के पास परमाणु रिएक्टरों की संख्या कुल 22 हो जाएगी। इस समय परमाणु रिएक्टरों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में नौंवे स्थान पर है।
हालाँकि भारत की कुल ऊर्जा जरूरत का महज तीन फीसदी परमाणु ऊर्जा से आता है। डील के बाद भी यह बढ़कर महज छह फीसदी ही होगा, लेकिन फिर भी एशिया में भारत परमाणु ऊर्जा के मामले में चीन, जापान व कोरिया से भी आगे है।
ऊर्जा की माँग को पूरा करने के लिए भारत परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश कर रहा है। परमाणु ऊर्जा एक लिहाज से आकर्षक इसलिए भी है, क्योंकि इससे प्रदूषण ज्यादा नहीं होता। कई देशों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते जहरीली गैसों का उत्सर्जन कम करने का दबाव है। खासकर चीन और भारत पर, इसलिए भी परमाणु ऊर्जा एक आसान विकल्प लगता है, लेकिन परमाणु ऊर्जा से पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा, यह सही नहीं है।
परमाणु रिएक्टरों में यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे पदार्थों का विकिरण किया जाता है, जिससे तेज तीव्रता वाली ऊर्जा बनती है। हर औद्योगिक प्रक्रिया की तरह यहाँ भी कचरा पैदा होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस कचरे के अधिकतर हिस्से को रिसाइकल करना नामुमकिन होता है। यूरेनियम संवर्द्धन से निकले कचरे में वर्षों तक रेडियोधर्मिता होती है। मिसाल के तौर पर प्लूटोनियम 6500 वर्षों तक रेडियो ऐक्टिव रहता है, जो पर्यावरण और मानव के लिए अति हानिकारक होता है।
रेडियोधर्मी पदार्थों के सीधे संपर्क में आने से कैंसर का खतरा कई गुना ज्यादा हो जाता है। 1945 में हिरोशिमा व नागासाकी पर परमाणु हमले का असर आज की पीढ़ी पर भी देखा जा सकता है। भारत में अगले वर्षों में 100 मेगावाट वाले आठ नए परमाणु रिएक्टर बनने वाले हैं। एक हजार मेगावाट बिजली से 27 किलोग्राम उच्चस्तरीय रेडियोधर्मी कचरा पैदा होगा, जिसे असक्रिय होने में एक लाख साल लग सकते हैं। इसलिए भारत में जहाँ परमाणु समझौतों को लेकर खुशी का माहौल है, वहीं यह चिंता भी है कि परमाणु कचरा कैसे और कहाँ फेंका जाएगा?
परमाणु कचरा फेंकने के लिए अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों ने कुछ प्रक्रियाएँ तय की हैं। इनमें से एक है- समुद्र में कचरा फेंकना। शुरुआत में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों ने यह सस्ता तरीका अपनाया, लेकिन इस बीच अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। फिर भी दुनिया में 60 प्रतिशत परमाणु रिएक्टरों का नियंत्रण कर रहा रूस अब भी बड़े सागरों में परमाणु कचरा फेंक रहा है। रूस के पर्यावरण मंत्री के अनुसार रूस आगे भी ऐसा करता रहेगा, क्योंकि इसके अलावा उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।
परमाणु कचरे से निपटने के लिए एक और तरीका है कि इसे जमीन में दफना दिया जाए, लेकिन यह भी आसान नहीं है। लाखों वर्षों तक रेडियोधर्मी किरणें सक्रिय रहती हैं। थोड़े समय बाद पृथ्वी पर इतनी जगह नही रह जाएगी कि सारा कचरा जमीन में डाल दिया जाए।
एक और तरीका है इस कचरे को पृथ्वी से कोसों दूर अंतरिक्ष में फेंकना। यह अब तक का सबसे सुरक्षित तरीका समझा जा रहा है, लेकिन महँगा भी बहुत है।
फिलहाल अब तक भारत के लिए परमाणु कचरा फेंकना कोई बड़ी समस्या नहीं रही है। इस समय मुख्य रूप से जादूगोड़ा में परमाणु कचरा रखा जा रहा है, जो जमशेदपुर और खडगपुर रेलवे लाइन के बीच का इलाका है। आलोचकों का मानना है कि इस जगह से रेडियोधर्मी किरणों का रिसाव हो रहा है, जो इस क्षेत्र को खतरनाक बना रहा है।
सन 2000 तक भारत में कुल बिजली का केवल 2.5 प्रतिशत हिस्सा परमाणु ऊर्जा से प्राप्त हो रहा था, लेकिन 2020 तक यह बढ़कर 5 से 7 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। इसके साथ ही कचरे का प्रबंधन और मुश्किल हो जाएगा, तब पश्चिमी देशों को मदद के लिए आगे आना होगा। |