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इधर जश्न, उधर रेडिएशन से हाहाकार
-भाषा सिंह
सरकारी गलियारों में अमेरिका से परमाणु समझौते पर भले ही जश्न हो रहे हों, वर्षों से चल रहे नरोरा परमाणु संयंत्र के आसपास रहने वाले लाखों लोग परमाणु रेडिएशन से हो रहे विकलांग बच्चों, गर्भपात, चर्म रोग तथा कैंसर जैसी घातक बीमारियों से त्राहिमाम कर रहे हैं। यह हालत देश के कुछ अन्य भागों में स्थापित परमाणु संयंत्रों से सटे कस्बे और गाँवों में भी है।

इस बारे में अब तक सरकार की तरफ से कोई स्वास्थ्य सर्वेक्षण नहीं करवाया गया है, जबकि लंबे समय से इसकी माँग उठ रही है। पड़ताल के दौरान यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि खुलेआम नियमों का उल्लंघन हो रहा है।

परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार संयंत्र के 1.6 किलोमीटर
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के दायरे में कोई इनसानी रिहाइश नहीं होनी चाहिए और इसके बाद 5 किलोमीटर तक बहुत कम लोगों की रिहाइश हो, जिसे संकट के समय आराम से खाली कराया जा सके और 16 किलोमीटर के दायरे में 10 हजार से अधिक की आबादी न हो।


लेकिन तमिलनाडु के कोडानकुलम में निर्माणाधीन संयंत्र के पाँच किलोमीटर के भीतर तीन बड़ी कॉलोनियाँ हैं। देश में पहले से मौजूद परमाणु संयंत्रों से होने वाले रेडिएशन और उसका लाखों लोगों पर पड़ने वाले जानलेवा असर के कारण लंबे समय से इनका विरोध होता रहा है।

मशहूर परमाणु वैज्ञानिक एनवी रमन्ना ने बताया कि इन संयंत्रों को तुरंत बंद कर देने की जरूरत है, वरना इन इलाकों की पूरी अगली पीढ़ी विकलांग और भयानक समस्याओं से पीड़ित पैदा होगी। चाहे वह गुजरात के सूरत शहर के पास बने काकरापार परमाणु संयंत्र की बात हो, राजस्थान के रावत भाटा संयंत्र की या बेंगलुरु से 500 किलोमीटर दूर बने कैगा संयंत्र या केरल का परिमगोम संयंत्र या उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर का नरोरा परमाणु संयंत्र-हर जगह इसके दुष्प्रभाव लोगों के बदन पर चस्पा हैं।

दिक्कत यह है कि यह असर जिनके शरीर पर पड़ रहा है वे तो जानते हैं कि ये रेडिएशन का असर है, लेकिन ऐसा साबित करना उन गरीबों के बूते की बात नहीं है।

तकरीबन हर संयंत्र की स्थापना से लेकर उसके चालू होने के बाद तक वहाँ इस बाबत आंदोलन हुआ है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं। करार के बाद संयंत्रों की बढ़ती संख्या के साथ क्या इन दुष्प्रभावों में हजारों गुना बढ़ोतरी होगी?

नरोरा संयंत्रों की स्थापना के बारे में जो मिथ फैलाया जाता है कि उससे इलाके का विकास होगा, कम से कम नरोरा उसे झुठला देता है। सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क, यह आप इस इलाके की सड़क यात्रा करते समय खुद से पूछेंगे। इतना बड़ा संयंत्र है और बिजली पैदा हो रही है, नियमों के अनुसार आसपास के इलाके को मुफ्त बिजली मिलना चाहिए, पर ऐसा नहीं है।

यहाँ के गाँवों में तो बिजली के तार तक नहीं हैं। संयंत्र के बारे में पूछते ही लोग रेडिएशन की चर्चा करना शुरू कर देते हैं। कैंसर, गर्भपात और विकलांग बच्चों से पटा है पूरा इलाका।

यहाँ सात साल के रामू से लेकर 55 साल के जागेसुर तक सबकी जबान पर रेडिएशन शब्द इस तरह से मौजूद था कि मानो यह उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हो। रेडिएशन यानी विकेंद्रीकरण एक भारी शब्द है और इस पर गहरे शोध बड़े वैज्ञानिक करते हैं, लेकिन बुलंदशहर जिले के नरोरा इलाके में 1991 से चल रहे परमाणु संयंत्र के आसपास के गाँवों में यह लोगों की आम बोलचाल का, उनके जीवन का हिस्सा नजर आता है।

गुड्डू की माँ जुगेशरी अपनी पाँच साल की बच्ची का बदन उघाड़कर दिखाती है।
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उसके बदन पर पड़े काले दाग और पूरे बदन पर फैली है खुजली। कमोबेश ऐसा ही हाल है नरोरा गाँव के अधिकतर बच्चों का। गीता अपने दो महीने के बच्चे को लेकर बेतरह परेशान है और दिल्ली तक के अस्पताल के चक्कर काट चुकी है। बच्चे के दोनों पैर बुरी तरह से मुड़े हुए हैं। परमाणु संयंत्र के पास खेतों पर काम करने वाली, घूँघट से मुँह ढँके हुए गीता बताती है कि उसके साथ खेतों में काम करने वाली कई औरतों को इसी तरह विकलांग बच्चे पैदा हुए।


उसके अपने पैरों की पूरी चमड़ी उतर चुकी है, वजह खेत प्लांट के पास हैं और वहाँ पानी और भाप दोनों से ही रेडिएशन आता है। यह मानना सिर्फ गीता का नहीं उस इलाके के अधिकतर लोगों का है। गाँवों के बड़े-बूढ़े अपने बालों की सफेदी का हवाला देते हुए कहते हैं कि उन्होंने दो दशक से पहले बच्चों में इतनी विकलांगता कभी नहीं देखी।

छत्रपाल 40 साल की उम्र में 60 से ज्यादा के दिखते हैं। इस संयंत्र में तीन साल से अधिक काम करने के बाद छत्रपाल खुद को रेडिएशन का शिकार बताते हैं। हड्डियों के ढाँचे में तब्दील हो चुके छत्रपाल बिस्तर पर ही है और रेडिएशन की मार दिखाने के लिए बिना झिझक अपने कपड़े खोल देता है। उनका पूरा बदन झुलसा हुआ, काले चकत्तों से अटा नजर आता है।

छत्रपाल का कहना है कि मेरे साथ के न जाने कितने ही मर गए, किसी को कोई पता नहीं। जब कोई मेरे जैसे रेडिएशन का शिकार हो जाता है तो उसे मैनेजमेंट (संयंत्र) बाहर निकाल देता है। नरोरा के पूर्व उप-चेअरमैन वीरसिंह निषाद ने रेडिएशन और जनजीवन पर पड़ रहे बुरे असर के बारे में बताया कि इनसान तो इनसान, खेती पर इसकी बुरी मार पड़ी है।

ऐसी अनगिनत कहानियाँ नेवाड़ी, रामपुर, सिलहारी, रामघाट, निवाड़ी खादर, सुंदरनगरी, जयरामपुर खादर, बाजीतपुर, नित्यानंदपुर, ढकना नगला आदि कई गाँवों में पसरी हुई हैं।

संयंत्र प्रशासन इलाके में रेडिएशन की बात को नकारता है। नरोरा परमाणु संयंत्र में स्टेशन निदेशक बीबी मित्तल ने बताया कि उनके संयंत्र में सुरक्षा, विशेषकर रेडिएशन से सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की तरफ से जारी सुरक्षा मानकों का तो कड़ाई से पालन किया ही जाता है, उससे आगे बढ़कर खुद भी हर साल जाँच कराई जाती है।

संयंत्र में ग्यारह सौ कर्मचारियों में से 500 रेडिएशन कर्मचारी हैं और इन सबका हर साल पूरा मेडिकल चेक-अप कराया जाता है, जबकि मानकों के अनुसार यह तीसरे साल होना चाहिए। मित्तल इस बात से इनकार करते हैं कि उनके यहाँ रेडिएशन से पीड़ित होने का कोई मामला सामने आया है। इन गाँवों में फैली विकलांगता के बारे में मित्तल ने कहा, यूँ तो गाँवों में जितना कुपोषण है, इस तरह की विकलांगता कहीं भी हो सकती है। कुछ इलाकों में ज्यादा होती है, लेकिन इसका संयंत्र से कोई रिश्ता नहीं है।
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