त्वरित टिप्पणी....
बेंगलुरु, अहमदाबाद और अब दिल्ली... एक के बाद के लगातार हुए आतंकवादी हमलों से पूरा देश थर्रा उठा है। जब बेंगलुरु में विस्फोट हुए, उसके बाद पूरा देश हाई अलर्ट पर था, फिर भी अहमदाबाद में उससे भी बड़े पैमाने पर विस्फोट हुए। अब देश की राजधानी दिल्ली श्रृंखलाबद्ध धमाकों का शिकार हुई है।
दिल्ली तो आतंकवादी हमलों का इससे भी करारा दंश पहले भी झेल चुकी है। हमारे राष्ट्र की संसद ही जब महफूज नहीं है, तो बाकी सब तो होना ही था। कहा जा रहा है कि दिल्ली भी 'रेड अलर्ट पर' थी!! क्या मतलब इस रेड अलर्ट का? क्या ये महज शब्द हैं और अगर इस प्रक्रिया के कोई मायने हैं तो परिणाम क्यों नहीं दिखाई देते?
दरअसल ये देश और यहाँ के बाशिंदे इसी तरह की त्रासदियों को भोगने के लिए अभिशप्त हैं। चरम पर पहुँच चुके भ्रष्टाचार, अय्याशी और क्षेत्रवाद के बीच देश के बारे में सोचने के लिए किसी के पास फुरसत ही नहीं है। घटना हो जाने पर बस सब अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। जो देश अपनी संसद पर हमला करने वाले को आज तक फाँसी पर नहीं चढ़ा पाया, उस देश की नियति और क्या हो सकती है?
यही हमला जब व्हाइट हाउस पर करने की कोशिश की गई थी तो एक पूरे के पूरे देश को नेस्तनाबूद कर दिया गया... हम वो नहीं कर सकते तो दोषी को फाँसी तो दे ही सकते हैं... क्या इतना भी पौरुष और राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे पास नहीं है? सारे नेता और अधिकारी हर घटना के बाद यही बयान देते हैं कि हमारे देश के गृहमंत्री को तो बस अब इस्तीफा दे ही देना चाहिए। लगता ही नहीं कि स्थिति से निपट सकने का दमखम उनमें है।
दरअसल हम वर्षों से सहिष्णुता की आड़ में कायरता दिखाते आए हैं। राष्ट्र के बारे में सोचकर निर्णय लेने का समय और क्षमता हमारे पास है ही नहीं। निर्णय के कारक तो सीधे वोट बैक और तुष्टिकरण से जुड़े हुए हैं।
अंगरेजी में एक कहावत है- 'अ स्टिच इन टाइम, सेव्स नाइन', यानी अगर आप किसी उधड़ी हुई चीज को सिलने के लिए समय पर एक टाँका लगा लेते हैं तो आगे जाकर उसी चीज को सिलने के लिए आपको 9 टाँके लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यानी अगर कुछ गलत है, तो उसे रोकने के लिए उसी वक्त कदम उठा लेना बेहतर है। आज जिस आतंक के ज्वालामुखी पर पूरा देश बैठा है, वो फट पड़े उसके पहले हमें कठोर कदम उठा लेना चाहिए।
व्यवस्था और जिम्मेदार लोग तो पता नहीं अब और किस विपदा का इंतजार कर रहे हैं? अब जो भी है, खुद ही ध्यान रखें... और कोशिश करें कि तमाम निजी कार्यों के साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना को बेहतर तरीके से पुनर्स्थापित करने के लिए क्या किया जा सकता है, ये भी सोचते और करते रहें। 9/13 : धमाकों से दहली दिल्ली अहमदाबाद और बेंगलुरु में विस्फोट
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