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एक सोच जो बदल दे आपकी दुनिया
'पॉजिटिव थिंकिंग-डे' 13 सितंबर पर विशेष
आतंकवाद चरमपंथ विध्वंस और नकारात्मक सोच की तमाम बातों से दिन प्रतिदिन घिरती दुनिया को सकारात्मक सोच के साथ ही सकारात्मक कार्रवाई की जरूरत है।

यह मानना है विशेषज्ञों का जो लोगों को प्रेरित करने और उनका मनोवैज्ञानिक इलाज करने का काम करते हैं। उनकी निगाह में एक सोच आपकी दुनिया बदल सकती हैं सिर्फ विज्ञापन की भाषा नहीं है, बल्कि इसे जीवन में अपनाने से काफी कुछ बदल सकता है।

सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए ही पश्चिमी देशों में हर साल 13 सितंबर को 'पॉजिटिव थिंकिंग-डे' (सकारात्मक सोच दिवस) मनाया जाता है, जिस दिन लोग सही सोच के साथ दिन शुरू करते हैं और समाजिक कल्याण में भागीदारी करते हैं।

प्रख्यात प्रेरक और आठ भाषाओं में छप चुकी 'जीत आपकी' जैसी लोकप्रिय पुस्तक के लेखक शिव खेड़ा ने पॉजिटिव थिंकिंग-डे की पूर्व संध्या पर कहा कि सकारात्मक सोच से हर चीज के होने की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन सकारात्मक सोच के साथ ही सकारात्मक कार्रवाई भी होनी चाहिए।

राकलैंड अस्पताल से जुड़े वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एस सुदर्शन ने कहा कि आतंकवाद और विध्वंसक गतिविधियों जैसी समस्या दरअसल मूल्यों में आ रही कमी का नतीजा हैं। उन्होंने सवाल किया कि भारतीय आजादी की इतनी बड़ी लड़ाई में आतंकवाद कहाँ था। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति नैतिक मूल्यों वाले नेताओं के अभाव की वजह से भी है, क्योंकि महात्मा गाँधी जैसे नेता नहीं हैं।

सुदर्शन ने कहा कि सकारात्मक सोच से मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहने के साथ ही संपूर्ण अच्छाई होती है और नकामी का भान नहीं होता। उन्होंने कहा कि आमतौर पर भारतीयों में पाई जाने वाली विश्वास की कमी की समस्या का भी इससे निदान होता है।

मैक्स हेल्थ केयर में मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख ने कहा कि नकारात्मकता को दूर करने के लिए लोग आपने आस-पास से प्रेरणा ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि बदलाव के लिए व्यक्ति को स्वयं अपनी नकारात्मकता ढूँढ़नी चाहिए और उसे दूर करने के कदम उठाने चाहिए।

पॉजिटिव थिंकिंग-डे जैसी शुरुआत भारत में किए जाने के संबंध में खेड़ा ने कहा कि समाज के स्तर पर इस दिशा में कुछ किए जाने की जरूरत है। लोगों को प्रेरित करने के लिए पश्चिम के देशों का आमतौर पर दौरा करने वाले खेड़ा ने कहा कि भारत में टेलीविजन चैनलों के माध्यम से ज्योतिष, हस्तरेखा, रूद्राक्ष आदि का जो प्रचार किया जा रहा है वह हमारे कर्म के सिद्धांत के विपरीत है।

उन्होंने कहा कि भारतीय धार्मिक होते हैं, लेकिन यदि सिर्फ भाग्‍य और कुंडली से ही चीजें तय होती तो उन लोगों की शादियाँ क्यों नाकाम होती हैं जिनके विवाह जन्‍म पत्रियाँ मिलाकर किए जाते हैं। पश्चिम के लोगों से भारतीयों के अलग होने के बारे में पूछे जाने पर खेड़ा ने कहा कि पश्चिम के लोग हर चीज में इतने भाग्‍यवादी नहीं है उनमें संकल्प की भावना ज्यादा है।

इसके साथ ही उन्होंने सचेत किया कि सोच की सकारात्मकता में भी सोच रखनी चाहिए, क्योंकि कोई अप्रशिक्षित व्यक्ति यदि सकारात्मक सोच के साथ किसी के दिल का ऑपरेशन कर दे तो उसका क्या होगा।

सकारात्मक सोच के परिणाम के तौर पर खेड़ा ने फिल्म अभिनेत्री और नृत्यांगना सुधा चंद्रन का हवाला दिया और कहा कि यह संकल्प शक्ति का ही नतीजा है कि वह एक पैर होने के बावजूद अपनी कला का प्रदर्शन कर रही हैं।

लोगों में सकारात्मक सोच को बढ़ावा दिए जाने के बारे में उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से शरीर को मजबूत बनाने के लिए वर्जिश की जाती है उसी प्रकार लोगों को मानसिक शक्ति बढ़ाने के लिए अभ्यास की जरूरत होती है, जिसके बहुत से विकल्प मौजूद हैं।

डॉ. सुदर्शन ने कहा कि समाज में समान अवसरों के अभाव गरीबी बेरोजगारी और भेदभाव जैसी चीजों की वजह से लोग आसानी से भ्रमित हो जाते हैं और किसी भी विचारधारा को स्वीकार करने को तैयार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इन चीजों को समाज में यदि दुरुस्त किया जाए और बच्चों को शुरू से ही पुख्ता तरीके से नैतिक शिक्षा दी जाए तो समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
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