स्कंद पुराण, वाल्मीकि रामायण जैसे पौराणिक ग्रंथों तथा प्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा नदी के कारण होने वाले विनाश और पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है।
प्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी कृति परती परिकथा में कोसी के रौद्र रूप तथा इसके कारण होने वाले विनाश और निर्माण को सजीव ढंग से प्रस्तुत किया है।
रेणु ने परती परिकथा की शुरुआत धूसर वीरान परती जमीन विशेषण से की है जो उसके रौद्र रूप को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने आँचलिक लोकगीत के जरिये भी इसे बड़े ही सजीव ढंग से पेश किया है। रेणु कहते हैं... थर-थर काँपे रोज अंगनवा रोये जी आकास। घड़ी-घड़ी पर मूर्छा लागे बेर-बेर पियास घाट न सूझे बाट न सूझे, सूझे अप्पन हाथ।।
रेणु ने परती परिकथा में लिखा है कि कोसी की शादी के बाद उनका संबंध ससुराल वालों के साथ अच्छा नहीं रहा। उनकी ननद जोगवंती और गुणवंती उन्हें काफी सताती थीं। इसके कारण एक दिन वे घर छोड़कर निकल जाती हैं।
कोसी को घर छोड़कर जाता देख गुणवंती तंत्र साधना कर उन्हें रोकने का प्रयास करती है, जबकि जोगवंती आँधी-तूफान उत्पन्न कर उनका मार्ग अवरुद्ध करने का प्रयास करती हैं।
दूसरी तरफ कोसी की सौतेली बहन दुलारी ने पौष पूर्णिमा के दिन उनकी याद में बररिया घाट पर दीया जलाया था। आज भी लोग घाट पर दीया जलाने की इस परंपरा को कायम रखे हुए हैं।
इसके बाद कोसी क्षेत्र के लोगों को विनाश का श्राप दे देती है, लेकिन बाद में उसका मन पिघल जाता है। लोगों के दुख के क्षुब्ध कोसी कहती हैं... जहाँ-जहाँ बैठकर मैं रोऊँगी वहाँ खुशहाली और जबरदस्त हरियाली होगी।
कोसी क्षेत्र में इस महा जलप्रलय के बाद लोगों को उम्मीद है कि गंगा से मिलन के बाद इस क्षेत्र में खुशहाली जरूर लौटेगी। स्कंद पुराण में कोसी का शिव-पार्वती की पुत्री के रूप में उल्लेख किया गया है। इस लिहाज से उन्हें गणेश और गंगा की बहन भी कहा गया है। इसमें कहा गया है कि कोसी का ब्याह एक ऋषि के साथ हुआ था, जिनकी असमय मृत्यु हो गई।
ऋषि की असमय मृत्यु से कोसी को काफी दुख हुआ। इसके बाद जब भी उन्हें अपने परिवार के लोगों की याद आती है तो वह रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपनी बहन गंगा के मिलने के बाद शांत हो जाती है।
इसके बाद क्षेत्र में खुशहाली का भी उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण में कोसी नदी का उल्लेख कोसिका मैया के रूप में मिलता है। कोसी क्षेत्र में गणेश चतुर्थी के अवसर पर कोसी नदी के घाट पर पूजा अर्चना की जाती है।
इसके अलावा इसी समय चौड़-चंद्र के दौरान भी कोसी नदी की पूजा की जाती है। कोसी नदी का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है, जहाँ उन्हें विश्वामित्र की बहन बताया गया है।
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