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श्‍ाहनाई सम्राट को मयस्‍सर नहीं 'मकबरा'
बिस्मिल्लाह खान की पुण्यतिथि 21 अगस्त पर विशेष
गंगा मैया के समीप शहनाई बजाने के मजे से महरूम होने से बचने के लिए विदेश में बसने की तमाम पेशकश ठुकराने वाले भारत रत्न शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को अब अपने शहर में ही स्थाई स्मारक के तौर पर ठीक-ठाक मकबरा भी नसीब नहीं हो पा रहा है, जिससे उनके परिजन और प्रशंसक गमजदा हैं।

अपने जीवनकाल में ही सरकार की ओर से समुचित सहायता नहीं मिलने पर कई दफा आवाज उठाने वाले भारत रत्न शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के निधन के बाद भी अधिकतर सरकारी घोषणाएँ लालफीताशाही का शिकार बन गईं है।

बिस्मिल्लाह खान के पुत्र और उनकी शहनाई संगीत परंपरा के वारिस नैयर हुसैन ने बातचीत में बेहद दुख और नाराजगी भरे अंदाज में कहा कि दो साल में सिर्फ घोषणा ही घोषणा हुई है, कोई भी काम नहीं हो पाया है।

वाराणसी में उनकी प्रतिमा लगाए जाने के बारे में पूछे जाने पर हुसैन ने कहा कि प्रतिमा तो जाने दीजिए अभी तक मकबरे के बारे में भी कुछ नहीं हुआ है।

खाँ साहब के इंतकाल के बाद सपा प्रमुख मुलायमसिंह, केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान और सांसद राज बब्बर आए थे। उन्होंने तमाम घोषणाएँ कीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ। गंगा जमुनी तहजीब वाले बनारस शहर की पहचान बन चुके बिमिल्लाह खान इस शहर को छोड़ने के हर प्रस्ताव को कड़ाई से ठुकरा दिया करते थे।

इसी शहर में उनका स्थाई मकबरा न होने की बात उनके प्रशंसकों को बेहद साल रही है। हुसैन ने कहा कि उत्तरप्रदेश सरकार ने हमें मकबरे का नक्शा देखने को भेजा था, नक्शा बहुत अच्छा बना था। बाद में हमें बताया गया कि मकबरे के लिए 20 लाख रूपए मंजूर कर लिए गए हैं।

हुसैन ने बेहद तल्ख शब्दों में कहा कि पता नहीं वह नक्शा कहाँ गया। मंजूर किए गए 10-20 लाख रुपए कहाँ गए। कुछ नहीं मालूम। कई संस्थानों ने उनके नाम पर पुरस्कार शुरू करने, संगीत अकादमी खोलने की घोषणाएँ की, लेकिन सब केवल घोषणाएँ ही निकलीं।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने बचपन से ही शहनाई प्रेम को इबादत बना लिया और उन्हें सगीत के लिए देवी सरस्वती के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और मंदिरों और गंगा के घाट पर शहनाई बजाने में कभी परहेज नहीं रहा।

भारतीय समाज में शादी एवं अन्य शुभ समारोह में घर की ड्योढ़ी तक सीमित शहनाई को अंतरराष्ट्रीय फलक तक पहुँचाने में उस्ताद ने लंबा सफर किया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज देश-विदेश में शहनाई की लोकप्रियता का जो मुकाम है वह सिर्फ उन्हीं के प्रयासों की देन है।

भारत को आजादी मिलने के बाद 1947 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने लाल किले पर शहनाई बजाई। इसी प्रकार पहले गणतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भी उन्हें शहनाई बजाने का ऐतिहासिक अवसर मिला।

उन्होंने अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका, सोवियत संघ, हांगकांग तथा तकरीबन सभी प्रमुख देशों की राजधानी को अपनी शहनाई की धुन से मोह लिया था। उस्ताद ने कुछ फिल्मों के लिए भी अपनी शहनाई की रागों का योगदान दिया।

उन्होंने महान फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म 'जलसा घर' में काम किया था तथा हिन्दी फिल्म 'गूँज उठी शहनाई' के लिए संगीत दिया था। उन्हें भारत रत्न के अलावा पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्म विभूषण भी मिल चुका था। यही नहीं उन्हें संगीत नाटक अकादमी तानसेन अवार्ड जैसे तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले।

इस महान संगीतकार का संक्षिप्त बीमारी के बाद 21 अगस्त 2006 को निधन हुआ। उस्ताद कहा करते थे कि यदि दुनिया का अंत हो भी गया तो भी संगीत जिंदा रहेगा। इस बात को अगर यूँ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारतीय संगीत के जीवित रहने तक शहनाई और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम जिंदा रहेगा।
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