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बदहवास जनता... अस्पताल में दर्द से कराहते लोग... रुदन करते परिजन... चिथड़ों में लिपटी लाशें...ये दृश्य मानो आम हो गए हैं। पहले जयपुर फिर बेंगलुरु और उसके अगले ही दिन गुजरात का प्रमुख शहर अहमदाबाद आतंकवादियों का निशाना बना। सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को धता बताते हुए आतंकवादी एक बार फिर अपनी नापाक साजिश में सफल हो गए।

आखिर क्या कारण हैं कि आतंकवाद का विषधर लगातार अपना फन फैलाता जा रहा है और हमारी सरकारें और सुरक्षा एजेंसियाँ ज्यादातर मामलों में नाकाम ही सिद्ध हो रही हैं। देशवासी दहशत में जीने को मजबूर हैं। बेंगलुरु और अहमदाबाद विस्फोटों के बाद भी हमेशा की तरह नेताओं की बयानबाजी होगी, मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे का ऐलान होगा और फिर सब पहले जैसा हो जाएगा, मगर उन चेहरों के आँसुओं के पीछे छिपा दर्द और पीड़ा को शायद ही कोई पहचान पाए, जिन्होंने इन विस्फोटों में अपनों को खोया है।

...लेकिन संसद में नोटों का खेल खेलने वाले भला इस दर्द को कैसे महसूस कर सकते हैं। जहाँ सरकार बनाने और बिगाड़ने के लिए नोट लहराए जाते हैं, जिन्हें हम देश चलाने के लिए चुनकर भेजते हैं, वे ही हमें कैमरे के सामने बिकते हुए दिखाई पड़ते हैं। ईमानदारी की दुहाई देने वाली सरकारें बाहुबल और धनबल से अपने कार्यकाल का एक-एक दिन बढ़ाती हुई-सी लगती हैं। ऐसे में आम जनता की चिन्ता कैसे की जा सकती है?

कड़े कानूनों का अभाव, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, ढुलमुल सरकार वाले देश में आतंकवादी कब अपनी साजिश को अंजाम दे देते हैं, किसी को कानों-कान खबर नहीं हो पाती। इस देश में अफजल को फाँसी दी जाना चाहिए या नहीं दी जाना इस बार देशव्यापी बहस हो सकती है, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ कभी भी न तो जनता और न ही सरकारें कभी मजबूती से खड़ी दिखाई देती है। इसका एक अहम कारण यह भी है कि यहाँ आतंकवाद को धर्म के तराजू में तौला जाता है।

पिछले कुछ आतंकवादी हमलों में गौर करें तो लगता है कि इनके माध्यम से जनता में दहशत तो फैलाई ही जा रही है, कहीं न कहीं भारत की अर्थव्यवस्था पर भी आघात किया जा रहा है। पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर जो कि पर्यटन और व्यावसायिक केन्द्र है, को निशाना बनाना, फिर सूचना प्रौ‍द्योगिकी के प्रमुख केन्द्र बेंगलुरु में धमाके और उसके बाद गुजरात के प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र अहमदाबाद में विस्फोट करना तो कम से कम इसी ओर इशारा करता है। इस बार तो आतंकवादियों सभी हदें पार करते हुए अस्पताल को भी नहीं बख्शा।

मगर क्या आतंकवाद के फन को कुचलने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें गंभीर हैं? शायद नहीं, क्योंकि तीन माह से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी जयपुर विस्फोट में शामिल किसी भी व्यक्ति को नहीं पकड़ा जा सका है। बेंगलुरु विस्फोट के बारे में भी कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

ऐसा नहीं है कि आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के पास संसाधनों की कमी है। विश्व की शीर्ष सैन्य शक्ति, परमाणु शक्ति संपन्न देश यदि आतंकवाद के सामने कमजोर दिखाई पड़ रहा है तो उसका सबसे अहम कारण है सशक्त राजनीतिक नेतृत्व की कमी और देश से ज्यादा दलीय हितों को महत्व देने वाले राजनीतिक दल। वैसे अभी भी देर नहीं हुई है। बस जरूरत है ईमानदार प्रयासों की। (वेबदुनिया)
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