पद के दुरुपयोग के मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो की दूसरी क्लोजर रिपोर्ट को ठुकराते हुए एक विशेष अदालत ने शनिवार को जाँच एजेंसी को फटकार लगाई और गृह मंत्रालय से मंजूरी के बिना पूर्व रेल मंत्री सीके जाफर शरीफ पर मुकदमा चलाने का निर्देश दिया।
विशेष सीबीआई न्यायाधीश आरके यादव ने कहा ये पहलू स्पष्ट करते हैं कि असंगत कारणों से मौजूदा क्लोजर रिपोर्ट सीबीआई के जाँच अधिकारी द्वारा दाखिल की गई है। मैं समझता हूँ कि जाँच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जाँच के लिए सीबीआई निदेशक से कहना जरूरी है।
अदालत ने कहा मैं अपराध का संज्ञान लेता हूँ। चूँकि शरीफ काफी पहले लोकसेवक नहीं रह गए हैं, इसलिए भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 19 के तहत किसी मंजूरी की जरूरत नहीं है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल के सदस्य शरीफ ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों आरआईटीईएस और इरकॉन के प्रबंध निदेशकों पर 1995 में मंत्रालय के तीन कर्मचारियों की लंदन यात्रा की मंजूरी के लिए कथित तौर पर दबाव डाला।
हृदय की बीमारी से पीड़ित मंत्री ने लंदन के प्रिंसेस ग्रेस अस्पताल में अपने इलाज के वक्त उनके सहयोगियों को अपने साथ रखना चाहा। सीबीआई के अनुसार शरीफ ने अपने अतिरिक्त निजी सचिव बीएन नागेश और उनके दो स्टेनोग्राफर एसएम मस्तान और वी. मुरलीधर को अपने साथ ले जाकर राजकोष को 7.52 लाख रुपए का नुकसान पहुँचाया।
अदालत ने कहा अपराध के लिए शरीफ पर मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। चूँकि आरोप-पत्र दर्शाता है कि ये व्यक्ति उनके अभियान पर शरीफ के साथ गए। अदालत ने जाँच अधिकारी से गवाहों की सूची और पूर्व मंत्री का मौजूदा पता अतिरिक्त दस्तावेजों के साथ 14 दिन के भीतर दाखिल करने को कहा।
जाँच के दौरान सीबीआई द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों के निरीक्षण के बाद अदालत ने कहा शरीफ ने बेईमानी से राइट्स और इरकॉन के प्रबंध निदेशकों से तीन लोगों को अपने निजी कामों के लिए लंदन जाने की यात्रा मंजूर कराई, जिसके लिए वे अधिकृत नहीं थे।
कोर्ट ने कहा मंत्री ने लोक सेवक के रूप में अपने पद का दुरुपयोग किया और अपने या बीएन नागेश, वी. मुरलीधर तथा एचएच समसुल के लिए 7.52 लाख रुपए का आर्थिक लाभ लिया। नवंबर 2000 में हाई प्रोफाइल मामले में जाँच पूरी होने पर सीबीबाई ने शरीफ पर मुकदमा चलाने के लिए लोकसभा सचिवालय से संपर्क किया।
लोकसभा सचिवालय ने सीबीआई की दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और गृह मंत्रालय से संपर्क करने को कहा, जिसने 20 अक्टूबर 1995 को शरीफ पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी, जिसके बाद अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई। अदालत ने तब यह आशंका जताते हुए क्लोजर रिपोर्ट ठुकरा दी कि जाँच एजेंसी ने मंत्रालय को सभी प्रासंगिक दस्तावेज नहीं दिए होंगे।
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