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अनुशासक पर अनुशासनहीनता की गाज  Search similar articles
सोमनाथ चटर्जी का राजनीतिक सफर
वाह रे नियति। लोकसभा में सांसदों को मर्यादा और अनुशासन के लिए डपटने वाले सोमनाथ चटर्जी को बुधवार को उनकी पार्टी माकपा ने अनुशासनहीनता के आरोप में निष्कासित कर दिया। यह उस व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा का वह कड़वा पड़ाव है, जो करीब चार दशक तक संसद में पार्टी का उदारवादी और वाकपटु चेहरा रहा।

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माकपा ने कामरेड चटर्जी को लोकसभा अध्यक्ष का पद छोड़ने का पार्टी का आदेश नहीं मानने पर निष्कासित किया। नियति और किस्मत जैसी चीजों को न मानने वाली कैडर आधारित पार्टी के लिए 1971 से पार्टी के टिकट पर 10 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित नेता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना निश्चित तौर पर बहुत कठिन रहा होगा।

विश्वास प्रस्ताव से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के पद को पार्टी लाइन से परे बताकर इसे न छोड़ने की चटर्जी की दलील के बाद उनके खिलाफ पार्टी की कार्रवाई आसन्न लग रही थी, लेकिन यह पहला मौका नहीं था जब गंभीर आवाज वकील का तर्कपूर्ण मस्तिष्क और मुद्दों पर बेबाक राय रखने वाले सोमनाथ दा का पार्टी की आधिकारिक लाइन से मतभेद हुआ।

दो दिन बाद शुक्रवार को अपना जन्मदिन मनाने जा रहे चटर्जी (79) पार्टी के उन कुछ चुनिंदा लोगों में थे, जिन्होंने माकपा के वयोवृद्ध नेता ज्योति बसु की 1996 में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। हालाँकि पार्टी के कट्टरपंथियों ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था, जिसे कई लोगों ने ऐतिहासिक गलती के तौर पर बाद में स्वीकार किया।

असम के तेजपुर में 25 जुलाई 1929 को रुढ़िवादी परिवार में जन्मे चटर्जी के पिता हिन्दू महासभा के नेता थे। कोलकाता और इंग्लैंड में शिक्षा पाने वाले चटर्जी ने कैम्ब्रिज से अपनी स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की और ब्रिटेन से बार एट लॉ किया ताकि वकील बन सकें।

चटर्जी ने 1968 में राजनीति और माकपा में कदम रखा तथा तीन साल बाद अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र बोलपुर से लोकसभा के लिए चुने गए। बहस कौशल और वाक कला में माहिर चटर्जी ने संसद में अपनी छाप छोड़ी, जिसका नतीजा यह रहा कि उन्हें 1989 में पहली बार माकपा संसदीय दल के नेता का ओहदा संभालने का मौका मिला।

राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर तर्कपूर्ण और स्पष्ट समझ के साथ अपनी बात रखने वाले चटर्जी को 1996 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान हासिल हुआ। अंग्रेजी भाषा पर जबर्दस्त पकड़ रखने वाला यह बजुर्ग नेता सदन में बांग्ला भाषा से प्रभावित हिन्दी में की गई चुटीली टिप्पणियों से गुदगुदाता भी है।

खेलों विशेष तौर पर क्रिकेट के शौकीन चटर्जी युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और इसका ताजा नमूना हाल के संसद के विशेष सत्र में भी देखने को मिला जब उन्होंने उप-चुनावों में नव-निर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाने के बाद कहा कि अब सदन में 38 युवा सदस्य हो गए हैं, जिनकी उम्र 35 वर्ष से कम है।

लोकसभा अध्यक्ष सरीखा उच्च संवैधानिक पद धारण करने वाले पहले मार्क्सवादी चटर्जी को 1984 में पराजय का सामना करना पड़ा था। अन्यथा उन सभी लोकसभा चुनावों में विजय ने उनका वरण किया, जिसमें वे उतरे। 84 में उन्हें तत्कालीन कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के हाथों उनके पारम्परिक जादवपुर निर्वाचन क्षेत्र में पराजय का सामना करना पड़ा था, जो माकपा का गढ़ माना जाता है। उसके बाद उन्होंने क्षेत्र बदल दिया और बोलपुर चले गए।

माकपा जैसी पार्टी में चटर्जी को हमेशा उन कुछ मुट्ठीभर लोगों में माना गया जो कुछ ज्यादा उदारवादी थे। वे ज्योति बसु के करीबी माने जाते थे। बसु ने 1990 के दशक में ऐसे समय में चटर्जी को राज्य औद्योगिक परिषद का अध्यक्ष बनाया जब वाम मोर्चा सरकार को माकपा के उग्रपंथी मजदूर संगठनों के बावजूद घरेलू और विदेशी पूँजी निवेश की दरकार थी।

चटर्जी ने अध्यक्ष का पद न छोड़कर भले ही माकपा नेतृत्व को नाराज किया हो, लेकिन पार्टी के कर्ताधर्ताओं के साथ यह उनकी पहली टकराहट नहीं है।

करीब डेढ़ दशक पूर्व 1992 में पार्टी ने चटर्जी और उस समय उनके पार्टी सहयोगी सैफुद्दीन चौधरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। चौधरी को बाद में कांग्रेस के साथ कथित तौर पर उस समय मेलजोल बढ़ाने के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, जब माकपा की आधिकारिक लाइन कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने की थी।

सदन का लंबे समय तक सदस्य रहने के नाते संसदीय नियमों और परंपराओं तथा भाषण कौशल की महारत ने 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद चटर्जी को अध्यक्ष पद का स्वाभाविक और सर्वसम्मत उम्मीदवार बनाया।

दृढ़ प्रतिज्ञ और मूल्यों को समर्पित चटर्जी ने जरूरत के वक्त अपनी बात कहने में कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। चाहे यह पार्टी का मंच रहा हो या फिर कोई अन्य। लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने हमेशा निष्पक्षता की भावना से नियमों के तहत काम करने का प्रयास किया ताकि सदन की प्रतिष्ठा पर आँच न आने पाए।

चार साल के अब तक के अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें कई मौकों पर जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। चाहे यह उदंड सांसदों को अनुशासित करना रहा हो या फिर लाभ के पद या दागी सांसदों के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा सदन का वाक आउट।

उन्होंने बार-बार सांसदों को सदन में जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करने और संसद की गरिमा बनाए रखने की नसीहत दी है। विधायिका की आजादी के प्रबल समर्थक चटर्जी ने कई बार न्यायिक सक्रियता की आलोचना की है और झारखंड विधानसभा में 2005 के विवादास्पद विश्वास मत से जुड़े उच्चतम न्यायालय के आदेश पर नराजगी जताने में भी नहीं हिचकिचाए।

लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने उच्चतम न्यायालय के आदेश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्वारा राय लिए जाने की वकालत की।
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