केंद्र में राजनीतिक ताकतों के नए ध्रुवीकरण में कांग्रेस ने शुक्रवार को सपा के साथ ऐसा करार करने में सफलता हासिल कर ली, जिसके तहत वह मनमोहनसिंह सरकार को बाहर से समर्थन देगी। इसके साथ ही वाम दलों के साथ सत्तारूढ़ दल के चार साल के कड़वाहट भरे संबंधों के समाप्त होने का मंच तैयार हो गया है।
कई सप्ताह से चल रहीं राजनीतिक गतिविधियाँ आज चरमोत्कर्ष पर तब पहुँची, जब सालों की कटुता को भुलाकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ यहाँ सपा नेताओं मुलायमसिंह यादव और अमरसिंह की बैठक हुई। इन नेताओं ने इससे पहले प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी।
लोकसभा में 39 सांसदों की ताकत रखने वाली सपा की ओर से समर्थन की साफ घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कांग्रेस ने देश के सर्वश्रेष्ठ हित और उसकी बहुत सामयिक मदद के लिए उसे धन्यवाद देने में देर नहीं की, जिससे सरकार को वाम से उबरने और विवादास्पद भारत अमेरिका परमाणु करार पर आगे बढ़ने मे सहायता मिलेगी।
समर्थन के एवज में सपा की उम्मीदों की सूची को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन यह साफ है कि पार्टी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगी। इसने पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के प्रति अपनी नापंसदगी छिपाई नहीं। हालाँकि कांग्रेस नेतृत्व इन दोनों प्रमुख मंत्रियों को हटाने की मंशा नहीं रखता।
अपनी पार्टी के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने की बात साफ करते हुए सपा महासचिव अमरसिंह ने कहा कि हम कोई सौदागर नहीं हैं। हम यहाँ मंत्रिमंडल में शामिल होने नहीं आए हैं। हमारी सारी राजनीति राष्ट्रीय हित के बारे में है।
देवड़ा विशेष तौर पर अमरसिंह की आलोचना की जद में आए, जिन्होंने तेल संकट के समय रिफायनरियों के लाभ का बचाव करने के लिए पेट्रोलियम मंत्री को निजी रिफायनरियों का मंत्री करार दिया। चिदंबरम की उन्होंने मुद्रास्फीति के लिए आलोचना की।
राजनीतिक परिदृश्य के दूसरे छोर पर वाम दलों ने अवसरवादी पाला बदल के लिए सपा की आलोचना की और सरकार को यह बताने के लिए सात जुलाई की अंतिम तारीख तय की कि क्या वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु निगरानी संस्था आईएईए में करार पर आगे बढ़ रही है।
सपा से करार अपनी झोली में आने के बाद कांग्रेस ने वामपंथियों को झटकने में देर नहीं लगाई और पार्टी महासचिव अभिषेक सिंघवी ने 'डेडलाइन' को खारिज करते हुए कहा कि संप्रभु सरकारें या राजनीतिक दलों पर अंतिम तारीखें नहीं लगाई जा सकतीं।
सपा के 39 सदस्यों के साथ संप्रग को शक्ति परीक्षण की स्थिति में आधे का आँकड़ा पार करने के लिए एक दर्जन से अधिक लोकसभा सदस्यों की आवश्यकता पड़ेगी। जदएस (2), रालोद (3) करीब छह निर्दलीय और कुछ एक सदस्यीय समूह सहयोगी बनाने के लिए संप्रग की निगाह में होंगे।
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